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प्रस्तावना

  • Writer: Chida nanda
    Chida nanda
  • May 1, 2018
  • 5 min read

ॐ गुरवे आदि शंकराचार्य नमः ॐ गं गणपतये नमः ॐ सकारात्मक / नकारात्मक ऊर्जा नमः ॐ कामाख्या देव्यै नमः ॥ऊं ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः ॥ 16 FACTS;- 1-साधना, मानवी प्रगति का अति महत्वपूर्ण आधार है। व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाने से बढ़कर जीवन की सार्थकता सिद्ध करने वाला और कोई उपाय नहीं। अंतस् में छिपी पड़ी प्रसुप्त विभूतियों को ढूंढ़ निकालने की तुलना में और कोई सम्पत्ति उपार्जन का लाभदायक व्यवसाय इस संसार में है नहीं। इसी मार्ग पर चलकर हम भौतिक और आत्मिक प्रगति के उभय प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं। 2-अन्तस् में सन्निहित क्षमताओं का विकृत स्वरूप ही असुर है और उनकी परिष्कृत स्थिति को देवता कहा जा सकता है। पेट में सड़ा हुआ अन्न विष बन जाता है और अनेकों रोग उत्पन्न करता है, यही असुरत्व हुआ। पचा हुआ अन्न रस, रक्त, शुक्र और ओजस् बनता है। यही देवत्व है। 3- देवता की आराधना का अर्थ है अपनी प्रवृत्तियों और क्षमताओं का सधाया हुआ सुविकसित स्वरूप। असुरता से आक्रान्त होने का अर्थ है अपने चिन्तन एवं कर्तव्य में अवाँछनीयताओं की भरमार। साधना का उद्देश्य है- व्यक्ति का काया-कल्प, चेतना का परिमार्जन। 4-कितने ही साधकों को विभिन्न देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के वरदान मिलने के कथानक कथा-गाथाओं में पढ़ने ,सुनने को मिलते हैं। यह वरदाता इष्टदेव अपना उच्चस्तरीय अंतस् ही है। जो कल्पना के अनुरूप वेष बनाकर सामने आ खड़ा होता है। दर्शन देता है और मनोकामनाएँ पूरी करता है। 5-मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली, एकलव्य के द्रोणाचार्य बाहर से नहीं आये थे, वरन् उन लोगों ने अपनी श्रद्धा को ही इन इष्टदेवों के रूप में परिपक्व किया था। श्रद्धासिक्त संकल्प ही आत्म-साक्षात्कार की -ईश्वर दर्शन की भूमिका बनाता है। 6-साधना का उद्देश्य पशु-प्रवृत्तियों के साथ देव-प्रवृत्तियों की टक्कर करना और पिछड़ेपन को उलट कर उस जगह प्रगतिशील की प्राण-प्रतिष्ठा करना है। इस प्रयास को आन्तरिक महाभारत, लंका-दहन, समुद्र-मंथन आदि पौराणिक गाथाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। निश्चित रूप से यही वह देवासुर संग्राम है, जिसे आत्मोत्कर्ष की विजय श्री का वरण करने वाले हर साधक को अनिवार्य रूप से लड़ना पड़ता है। 7-साधना का उद्देश्य अन्तरात्मा में ब्रह्मसत्ता का अवतरण करना है। यह प्रयास किस मात्रा में सम्भव हो सका, इसकी परख यही हो सकती है कि पशु को देवता बनाने की गतिविधियाँ कितनी ज्वलंत हो रही हैं। अग्नि परीक्षा प्रक्रिया सीता जी की वापसी के समय हुई थी, आत्मा रूपी सीता को परमात्मा रूपी राम से मिलने के लिए इसी जाँच में होकर गुजरना पड़ता है। रावण रूपी पशुत्व का कोई प्रभाव तो शेष नहीं है,सम्भवतः यही जाँचने के लिए अग्नि परीक्षा का उपक्रम किया गया था। सोने को खरा-खोट घोषित करने से पूर्व भी अग्नि परीक्षा और कसौटी की रगड़ आवश्यक होती है। साधना की इन्हीं में से किसी के साथ तुलना की जा सकती है। 8-साधना को किसी समृद्ध देवता की चापलूसी करके कुछ इनाम पुरस्कार झपट लेने की तिकड़म नहीं समझा जाना चाहिए जैसा कि आजकल आमतौर से समझा जाता है। जन्त्र-मन्त्रों को जादू नहीं समझा जाना चाहिए जिनके सहारे सहज ही लम्बे-चौड़े लाभ और चमत्कार प्राप्त होने की इन दिनों बाल कल्पना की जाती रहती है। उपासना विशुद्ध विज्ञान है जिसमें आत्म-परिष्कार के लिए प्रबल प्रयत्न करना पड़ता है। यह जितना गम्भीर वास्तविक और प्रखर होता है उसी अनुपात से व्यक्तित्व निखरता है निखार के साथ ही भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों को ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं। 9-विज्ञान की प्रगति ने सुख-साधनों की निश्चित रूप से वृद्धि की है। यह अभिवृद्धि जहाँ सुखद है, वहाँ निरंकुश बनते जाने के कारण एक भयावह समस्या भी है। सद्ज्ञान सम्वर्धन से ही इसका सन्तुलन बैठेगा। विज्ञान और तत्वज्ञान के सन्तुलित पहिये ही प्रगति रथ को सुनियोजित रूप से आगे बढ़ा सकने में समर्थ होंगे। यह प्रयोजन अध्यात्म विज्ञान के प्रति उसी स्तर की अभिरुचि उत्पन्न करने से सम्भव होगा जैसी कि इन दिनों भौतिक उपलब्धियों के लिए आकुलतापूर्वक संलग्न हो रही हैं। 10-व्यक्ति और समाज का हित इसी में है कि भौतिक दरिद्रता की भाँति ही आत्मिक क्षेत्र में धंसी संकीर्णता को भी मार भगाया जाय। इसके लिए उतने ही बढ़े-चढ़े प्रयास करने होंगे जैसे कि भौतिक प्रगति के लिए किये जा रहे हैं। खेद है कि इस असन्तुलन को दूर करने के लिए मूर्धन्य विभूतियों द्वारा वैसे प्रयत्न नहीं किये जा रहे हैं, जैसे कि आवश्यक थे। हमें इस अभाव की पूर्ति के लिए शक्ति भर प्रयत्न करने में संलग्न होकर युग की आवश्यकता पूरी करने में अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। 11-आत्मिक प्रगति के दो आधार हैं- एक ज्ञान दूसरा विज्ञान। ज्ञान पक्ष में ब्रह्मविद्या के आधार पर उस उत्कृष्ट चिन्तन का समावेश है, जिसमें आत्मा का स्वरूप, लक्ष्य, कर्तव्य, तत्व-दर्शन के रूप में समझा जाता है और जीवन की सार्थकता के लिए उच्चस्तरीय मार्ग दर्शन मिलता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है। धर्म-शास्त्रों का- तत्व दर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। 12-आत्मिक प्रगति का दूसरा आधार है- साधना। साधना वह प्रक्रिया है जिसमें अमुक विधि-विधानों कर्मकाण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु -प्रवृत्तियां अभ्यास में आती रही हैं उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। 13- मनुष्य की जो उच्च स्थिति है उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियां अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है। छोटे बच्चे कहीं भी मल-मूत्र का त्याग बिना संकोच के कर सकते हैं। पर प्रौढ़ावस्था में तो वैसा करना अनुपयुक्त ही माना जायगा। प्रौढ़ता के साथ जो मर्यादाएँ जुड़ी होती हैं, उन्हें पालन करना भी आवश्यक होता है। मनुष्य जन्म के अनुरूप आस्थाएँ विकसित करने के लिए पिछड़ी पशु-प्रवृत्तियों को उखाड़ना आवश्यक होता है। यह कार्य कठिन भी है और जटिल भी। समझने-समझाने भर से इतना बड़ा आन्तरिक परिवर्तन नहीं हो पाता जिसे पशुता के स्थान पर देवत्व की प्रतिष्ठापना का काया कल्प माना जाता है। 14-आत्मिक प्रगति के लिए ज्ञान और विज्ञान के दोनों चरण उसी प्रकार उठाने पड़ते हैं, जिस प्रकार कि भौतिक प्रगति के लिए इन्हीं दो आधारों को अपनाया जाना आवश्यक होता है। आर्थिक तथा दूसरे सुविधा साधन भी तो भौतिक ज्ञान-विज्ञान का सहारा लेकर ही प्राप्त किये जाते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए भी ब्रह्मविद्या पर आधारित तत्व ज्ञान हृदयंगम करना आवश्यक होता है। 15-योग-साधना एवं तपश्चर्या की समन्वित साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित्-शक्ति के सम्वर्धन का अलौकिक लाभ मिलता है।यदि आत्म साधना का सही स्वरूप और सही उद्देश्य समझा जा सके- यदि सही रीति-नीति अपनाकर आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जा सके- तो उसका अभीष्ट परिणाम मिलना सुनिश्चित है। 16-प्राचीन काल में जब साधना अपने वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त की जाती थी तो उसके सत्परिणाम भी प्रत्येक साधक को मिलते थे। यदि उसी प्राचीन परिपाटी को पुनः अपनाया जा सके तो इस महान् अवलम्बन का आश्रय लेकर मनुष्य में देवत्व का अवतरण और धरती पर स्वर्ग का वातावरण पुनः परिलक्षित हो सकता है।मानवता का सही अध्ययन पुस्तकें ही प्रस्तुत करती हैं । ''देवत्व का अवतरण ''का उद्देश्य पूरा हो सके इसकेचलते ही

प्रस्तुत पुस्तक को संकलित किया गया है -अपनी त्रुटियों के लिए आपसे क्षमायाचना करती हूँ,यह एक भक्त की विनती है... ... शिवोहम.....


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