top of page

Recent Posts

Archive

Tags

जीवजगत में इच्छा का क्या प्रभाव है?कैसे हो सत चित आनंद की प्राप्ति?भगवान श्रीकृष्ण के अलग-अलग स्वरू

  • Writer: Chida nanda
    Chida nanda
  • Jun 5, 2018
  • 14 min read

04 FACTS;- 1-भक्त जबतक इच्छा शून्य न हो जाय तबतक भाग्यहीन है इच्छा का स्थान ... वह तो हर एक मनुष्य में और हर एक स्थान में घुसी हुई है। प्रत्येक दिशामें वह रहती है और जब तक मनुष्य सो न जाए तब तक वह इच्छा जमीन से असमान की सैर कर आती है। 2-वह अत्यंत लघु है परन्तु उसमे अन्धकार इतना है कि उसने सारे संसारको अन्धा कर दिया है। जहा वह गयी,उसका नाश हो गया । जिसमे वह बैठ गयी वह नष्ट हो गया ।जब तक मनुष्य सब स्वार्थो का त्याग नहीं करता,तब तक वह उसे नहीं छोडती । 3- सबमे उसका अस्तित्व ऐसा है जैसा कि सोने,चांदी और ताम्बे में पानी का। इनमे चाहे जितना खोजो परन्तु पानी का पता नहीं चलेगा। मगर ज्यो ही आग पे रखो, पिघल कर सब पानी हो जाता है । इसी तरह जीवजगत अपने अज्ञानसे आश्चर्यमें पड़ा हुआ है। वासना लोगोके हिरदये में ऐसा ही प्रभाव रखती है जैसा कि वीर्यमें मांस,छिलका,हड्डीया छुपे हुए है। जितेंद्रिये लोग इच्छाके कारण थक गये है (इच्छा ही वासना है ) थोड़े ही लोग ईश्वरीय मार्ग में अंत तक पहुचते है। 4-इच्छा का इतना बड़ा प्रभाव है कि प्राय: महात्माओं सम्मान प्राप्त करनेसे एकदम अलग रखा है। इच्छा की एक कथा ;-

05 FACTS;- 1-एक संत ने बनमें निवास किया ! उसने अपने मनमें ये विचार किया कि किसी से भिक्षा नहीं मांगूगा ! यदि कोई वस्तु अपने आप मिल जाये तो उसको भी अपने हाथसे मुखमें नहीं डालूँगा ! जब कुछ दिन इस प्रतिज्ञा में बीत गये और कुछ खाया नहीं तो इच्छा खूब रोने लगी ! मगर रोने से उसे कुछ लाभ नहीं हुआ ! जंगल में किसी मेवे को या भूख की आग बुझानेवाली किसी वस्तु को उसने नहीं खाया !

2-जिस बृक्षके नीचे वह संत बैठा हुआ था,उस पर अकस्मात एक कौवा आ बैठा ! रोटी का एक टुकड़ा उसके मुख से नीचे गिरा और संत के सिर पर आ पड़ा ! उसे देखकर मन ने इच्छा की और उसमे व्याकुलता भी आयी,मगर उस संत ने मन को उधर नहीं जाने दिया ! और इन्द्रियोंको उसने कहा की मुझे अलग छोड़ दे ! मैं अपने हाथसे इस रोटीके टुकड़े को तुझे नहीं दूंगा ! भले तू आकर ले ले ! कहा जाता है कि ईश्वर के प्रताप से अंगूठे के बराबर सफेद चूहे के समान उसके मुँह से एक प्राणी बाहर आया ! उस रोटी के टुकड़े में से थोडा सा खाकर बापस लौटा जिससे कि उस संतके मुख मे वह प्रवेश करे !

3-संत ने उसे भीतर नहीं जाने दिया ! मुँहको बंदकर लिया और पूछा- तू कौन है..? उसने जवाब दिया कि मैं तेरी इन्द्रिय लोलुपता हूँ जो तुम्हें ईश्वर से वंचित रखती है ! फिर पूछा तेरा मालिक कौन है ..?उत्तर दिया -शैतान ! फिर पूछा तेरा निवास कहा है..?? उत्तर दिया परायेपन का अस्तित्व ! 4-संत ने कहा, कई दिनोंसे मैंने तुझे भोजन और जल नहीं दिये,तो तू मर क्यों नहीं गयी ..? उत्तर मिला कि जल और भोजन के सिवा और दूसरी चीज़े भी मेरी रोज़ी है -भोज्य वस्तु है जो मेरे जीवन और अस्तित्व का कारण है ! संत ने पूछा -वह क्या चीज़े है ..?? उत्तर मिला -उत्तम कर्मका अभिमान ! वह मेरा मुख्य भोजन है ! अपने योग किया और कहा कि अपने हाथसे कोई चीज़ तुझे खाने को नहीं दूंगा ! बस,माई और खुदी (अहम) है जिसने जगत को ईश्वर से अलग कर दिया है ! तेरा अस्तित्व मुझे ज्ञात है वह मच्छर के दानेसे अधिक नहीं ! परन्तु मेरा जीवन तेरे डर के कारण है ! इन्द्रियों का फरेब,कामेच्छा,गुमराही और भी जितने बुरे काम है वे मेरी रंगे और पुट्ठे है ! ईश्वरके लिये इच्छा के सिवा सभी इच्छाए मैं हूँ ! परन्तु जिसने अपने अहमको नष्ट कर दिया,वह स्वतंत्र हो गया और अपने ध्येय पर पहुँच गया | मनुष्य अपने अस्तित्व में /उपास्य से मिल जाता है और उसकी कृपा से उसे प्राप्त कर लेता है | 5-उस संतने खुदगर्जी हठधर्मी को अपनेमें जाने का मार्ग नहीं दिया और ईश्वर से मिल गया इच्छा की सूक्ष्मता इतनी अधिक है कि उसका बयान नहीं किया जा सकता | उसकी पहचान यह है कि जैसे पुष्पमें सुगंध होती है, वह सुगंध अपने आप उठती है और पवन पर सवार हो के चलती है | जिस स्थानसे वह आती है,आनेके समय उसे उसका ज्ञान नहीं होता | इसी तरह इच्छा का आना जाना भी किसी पर प्रगट नहीं होता | जब तक इधर उधर इच्छाओं के लिये स्थान है,तब तक वह इश्वर तक पहुँचने नहीं देती | क्योकि दुनिया में इन्ही के परिमाणको पुनर्जन्म कहते है |

भगवदगीता के अनुसार;- (सातवां अध्याय-ज्ञान-विज्ञान योग)

।।24।।

फल की इच्छा रखने वाले बुद्धिहीन मनुष्य मेरे परम उत्तम अविनाशी परम भाव को नहीं जानते हैं। इसी कारण मैं आत्म रूप जो मन बुद्धि इन्द्रियों से परे हूँ, को व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ देह धारी समझते हैं अर्थात योगमाया के आश्रित ईश्वर के स्वरूप को न समझने वाले सामान्य जन उन्हें मनुष्य ही समझते हैं क्योंकि उनके यथार्थ स्वरूप को समझने की न उनकी योग्यता होती है न दृष्टि। इसी प्रकार आत्मज्ञानी को भी जान पाना अत्यन्त कठिन है, उसके प्रति भी लोग व्यक्तिभाव ही रखते हैं।

।।25।।

योगमाया ज्ञान का हरण कर लेती है इसलिए मैं योगमाया के कारण छिपा रहता हूँ। प्रत्यक्ष मेरा मानव शरीर होता है, मेरे दिव्य स्वरूप आत्मतत्व को वह नहीं जान पाते। ऐसे अज्ञानी मुझ अविनाशी, जन्म रहित परमेश्वर को जन्म लेने वाला, मरने वाला समझते हैं।( यही कारण था भगवान श्री कृष्ण चन्द्र को उनके काल में कई राजा-प्रजा आदि उन्हें अपनी तरह का मानव समझते थे तथा यहीं विकार आज भी कई मनुष्यों में है।)

।।26।।

मैं विशुद्ध पूर्ण ज्ञान, नित्य होने के कारण पूर्व में व्यतीत हुए वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सभी भूतों को जानता हूँ परन्तु मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे स्वरूप अनुभूति नहीं हुयी हो, नहीं जानता।

।।27।।

हे अर्जुन इस संसार में इच्छा और द्वेष का कारण मनुष्य का शरीर ओर अहंकार है। इसी इच्छा और द्वेष के कारण संसार में सुख और दुख हैं और सभी संसार के लोग इनके पीछे पागल हुए दौड़ रहे हैं क्योंकि यह मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित कर देते हैं और मनुष्य कभी भी अपने श्रेय को नहीं प्राप्त कर पाता है। 28।।

परन्तु जिन योगभ्रष्ट पुरुषों का पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण पुण्योदय हुआ वे कर्म बन्धन से मुक्त स्वाभाविक रूप से राग द्वेष से मुक्त हो जाते हैं और दृढ़ निष्चयी होकर सूक्ष्म बुद्धि द्वारा मुझे अनुभव करते हैं, मुझे भजते हैं।

।।29।।

जो मनुष्य मेरी शरण आकर वृद्धावस्था, जन्म, मृत्यु से छूटने का यत्न करते हैं वह यत्न करते हुए ब्रह्म को, स्वभाव को, और सम्पूर्ण कर्म को जान जाते हैं। कर्म स्वभाव और ब्रह्म को जानकर अपना लक्ष्य ब्राह्मी स्वरूप को प्राप्त करने स्थित करते हुए सतत् यत्न करते हैं।

।।30।।

जो पुरुष मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ सहित अन्त काल में भजते हैं, जानते हैं; उत्पत्ति विनाश वाले पदार्थ जैसे शरीर, सृष्टि के तत्व अधिभूत हैं, जीवात्मा अधिदैव कहलाता है, परमात्मा अथवा विशुद्ध आत्मा अधियज्ञ है, जो इस बात का अनुभव कर लेता है वह सदा मुझ आत्म स्वरूप अधियज्ञ में अपना चित्त स्थापित कर लेते हैं क्योंकि हर मनुष्य परम श्रेय को पाना चाहता है और आत्मा ही परम श्रेय है। अतः तत्व से मुझे जान कर आत्मरत रहते हैं।

सत चित आनंद का क्या अर्थ है?-

09 FACTS;-

1-भगवान के अगणित नाम है ; पर उनमें से सबसे सुबोध और सार्थक नाम है ; सच्चिदानन्द। सत् का अर्थ है - शाश्वत, टिकाऊ, न बदलने वाला न समाप्त होने वाला।

इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वहीं है। परिवर्तनों का सूत्र संचालक भी वहीं है। उसी के गर्भ में यह समूचा ब्रह्माण्ड पलता है। सृष्टि तो महाप्रलय की स्थिति में बदल भी जाती है और फिर कालान्तर में नया रूप लेकर प्रकट भी होती रहती है। किन्तु नियन्ता की सत्ता में इससे कोई अन्दर नहीं आता। इसलिए परब्रह्म को ‘सत्’ कहा गया है।

2-चित् का अर्थ है - चेतना, विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप है। मानवी अन्तःकरण में इसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। मनोविज्ञानी इसका वर्गीकरण चेतन, अचेतन, सुपर चेतन के रूप में करते हैं। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं में भी चेतना अपने मूल स्वरूप में यथावत् बनी रहती है। सत्, रज, तम् प्रकृति में भी वहीं चेतना प्रकट और प्रत्यक्ष होती रहती है। मृत्यु के बाद भी उसका अन्त नहीं होता। विद्वान और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरोँ के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।

3-जड़ पदार्थ और प्राणि समुदाय के बीच मौलिक अन्तर तक ही है - चेतना का न होना। जड़ पदार्थों के परमाणु भी गतिशील रहते हैं। उनमें भी उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती है ; किन्तु निजी ज्ञान का सर्वथा अभाव रहता है। किसी प्रेरणा से प्रभावित होकर वे ग्रह-नक्षत्रों की तरह धुरी एवं कक्षा में घूमते तो रहते हैं ; पर संदर्भ में अपना कोई स्वयं का निर्धारण कर सकने की स्थिति में नहीं होते, जबकि प्राणि अपनी इच्छानुसार गतिविधियों का निर्धारण करते हैं।

4-प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनन्त चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों को व्यवस्था का एवं प्राणियों को चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता अर्थात् चेतन कहते हैं।

5-इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘आनन्द’ है। आनन्द जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसी ओर दौड़ता है।शराबी अपनी ही दुनिया में मस्त रहते हैं। गरीब रूखे-सूखे भोजन में षट्-रस व्यंजनों जैसा स्वाद और आनन्द लेते हैं।दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद जब मजदूर चारपाई पर पड़ते हैं, तो सुख की नींद में ऐसे खो जाते हैं, मानों उससे बढ़कर उनके लिए कदाचित् ही कोई दूसरा सुख हो। इसी प्रकार वैज्ञानिक, कलाकार, कृषक, संगीतकार सभी को अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुत रस मिलता है।

6-यह प्रकारान्तर से आनन्द के मूल-स्रोत का ही एक अंश मात्र है। इसे अक्षय नहीं कहा जा सकता है। पानी के बबूले की तरह इसका सृजन और विसर्जन होता रहता है। देखा गया है किसी को किसी क्षेत्र में यदि सुख की अनुभूति हो रही है। तो कुछ ही काल पश्चात् वह उसे नीरस और निरानन्द प्रतीत होने लगता है और ‘रस’ की खोज उसकी अन्यत्र चल पड़ती है। मूल अथवा शाश्वत ‘आनन्द’ की प्रकृति ऐसी नहीं। उसमें नीरसता अथवा एकरसता जैसी शिकायत नहीं होती।

7-उस परम आनन्द में मन नशे की भाँति डूबा रहता है और उससे वह बाहर आना नहीं चाहता ; किन्तु सांसारिक क्रिया-कलापों के निमित्त उसे हठपूर्वक बाहर जाना पड़ता है। यह अध्यात्म तत्वज्ञान वाला प्रसंग है और अन्तःकरण की उत्कृष्टता से संबंध रखता है। ऐसी स्थिति में आत्मा को स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर-प्राप्ति, समाधि जैसे आनन्दों की अपेक्षा रहती है।

वस्तुतः आनन्द प्रकारान्तर से ‘प्रेम’ का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु व्यक्ति एवं प्रवृत्ति से प्रेम हो जाता है, वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष ‘द्वेष’ उभर पड़े, तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान, गुणवान होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।

8-अँधेरे में जितने स्थान पर टार्च की रोशनी पड़ती है। उतना ही प्रकाशवान होती है।

वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टार्च-प्रकाश कहना चाहिए, जिसे जहाँ भी फेंका जायेगा, वहीं सुन्दर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारे दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान की आनन्ददायक अथवा अप्रिय, कुरूप जैसी परिस्थितियाँ गढ़ते-बनाते रहते हैं।

9-आनन्द ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुखद है अर्थात् ईश्वर ही आनन्द है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। यह स्पष्टतः जानना चाहिए कि परब्रह्म के अनेकानेक नाम हैं। उनमें से उसके प्रमुख तीन गुणों को समन्वय जिसमें है, उसे ‘सच्चिदानन्द’ कहते हैं।

कैसे हो सत चित आनंद की प्राप्ति?-

07 FACTS;-

1-परम्ब्रम्ह को सचिदानंद भी कहा जाता है. अर्थात सत,(अस्तित्व)चित (चेतना )और आनंद . सचिदानन्द कोई नाम नहीं परम्ब्रम्ह की अवस्था है जिसमे सत ,चित और आनंद समाहित है.

2-उपनिषद कहते है '' परमब्रम्ह की अवस्था में ब्रम्हांड के सम्पूर्ण अस्तित्व का बोध होता है ,परम्ब्रम्ह कारन है ब्रम्हांड का ,ब्रम्हांड कारन है पञ्च तत्वों (अग्नि,पृत्वी,जल,वायु और आकाश ) का और पञ्च तत्व कारन है भौतिक शरीर का और इसमें प्रवाहित होने वाली ऊर्जा है आत्मा का कारक.

3-उसी प्रकार संवेदना ,भावना ,और इच्छा कारक है मन या मस्तिस्क का ,हमारा शरीर ,आत्मा या मस्तिष्क कर्म से बंधे हुए है (कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन) भगवत गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है की चाहे कोई कितना भी संन्यास ले ले कर्मबंधन से मुक्त नहीं हो सकता क्यूंकि श्वास लेना भी एक कर्म है .

4-लेकिन आखिर मनुष्य के कर्म और साधारण जीवों के कर्म में क्या अंतर होना चाहिए कर्म 2 प्रकार के होते है

A-साधारण कर्म ;-

साधारण कर्म जो की साधारण आवेग और शरीर की इच्छाओं से निर्धारित होते है

B- कर्म योग;-

कर्म योग चेतन मन के द्वारा सांसारिक और शारीरिक बन्धनों से ऊपर उठ कर परम्ब्रम्ह की प्राप्ति के लिए के लिए किया गया कर्म कर्मयोग कहलाता है .

5-हमारा मन और व्यक्तित्व 5 प्रकार की अवस्थाओं से गुजरता है जिन्हें उपनिषद 'कोष' कहते है ;-

1-अन्नमयकोष

2-प्राणमयकोष

3-मनोमयकोष

4-विजननामय कोष

5-आनंदमय कोष

6-इसी प्रकार हमारा शरीर भी 3 अवस्थाओं में होता है जो की गहरी निद्रा ,स्वप्ना निद्रा और जागृत अवस्था से जुड़ा होता है , अन्नमय कोष भौतिक शरीर की अवस्था है जिसमे हमारी चेतना शरीर रूपी कैद में रहती है और शरीर की आवश्यकता और इछाओं से संचालित होती है ,परन्तु शरीर सिर्फ 5 तत्वों का ढांचा नही होता इसमें प्रवाहित होने वाली उर्जा या आत्मां प्राणमय कोष है और इस प्राणमय तथा अन्नमय कोष को नियंत्रित करने वाला मस्तिष्क मनोमय कोष ।

6-1-जब ये मनोमय अवस्था ज्ञानरुपी मष्तिस्क के नियंत्रण से संचालित हो तब विज्ञानमय अवस्था (कोष). परन्तु यदि ज्ञानरुपी अवस्था राजसिक ,या तामसिक हो तब आन्दमय अवस्था(कोष)को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

7- सच्चिदानन्द में समाहित आन्दमय अवस्था की प्राप्ति के लिए सत्व का होना आवश्यक है जब अन्नमय (भौतिक)प्राणमय (आत्मिक)और विज्ञानमय (बौधिक) तीनो अवस्थाएं सत्व /सात्विक बुद्धि से प्रेरित होकर कर्मयोग द्वारा संचालित होती है तो परम्ब्रम्ह अर्थात सचिदानंद की प्राप्ति होती है।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

मन कैसे स्थिर हो?क्या ध्यान आवश्यक है ?-

04 FACTS;-

1-प्रश्न यह है कि मन कैसे स्थिर हो? मन बड़ा चंचल है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि सब देवता मन के वश में हो गए पर मन किसी के वश में नहीं हुआ। यह ऐसा भीष्मदेव है, बलवानों से भी बलवान् है, जो किसी के भी वश में नहीं है। ऐसे मन को जो वश में करता है, वह देवों का देव है।

मन लोभी, मन लालची, मन चंचल, मन चौर। मन के मत चलिए नहीं, पलक पलक मन और।।

2-मन की चंचलता को दूर करने के लिए दिन-रात किसी भी समय एकान्त में बैठकर पहले कई बार गहरी व लम्बी सांस लें व छोड़े, इसी से मन शान्त व एकाग्र हो जाता है। फिर मन में ऐसा विचार करें कि एक ऐसी परमशक्ति सब जगह भरी हुई है जो सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है, आनन्द का समुद्र है; वह परमात्मा मेरे अंदर-बाहर, ऊपर-नीचे सब जगह पूर्ण है क्योंकि मैं उसी का अंश हूँ—‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी।’

3-परमात्मा एक ही है। वह एक ही तत्त्व अनेक रूपों में व्यक्त दिखाई देते हैं। साधक जिस रूप में उन्हें पकड़ना चाहे, वे उसी रूप में पकड़ में आ जाते हैं। निर्गुण, निराकार, सगुण, साकार सभी उनके रूप हैं।

4-ध्यान करते समय मन में अपने इष्टदेव की छवि, रूप या गुणों के बारे में सोचें। मन में उनसे प्रार्थना करें, किसी मंत्र का या ओंकार का या गायत्री मन्त्र का जाप करें या कोई सकारात्मक विचार दोहरायें जैसे—मै परमात्मा का अंश हूँ आदि। इस तरह ध्यान करने से मन में एकाग्रता आती है।

ध्यान कैसे करना चाहिए?-

07 FACTS;-

1-ध्यान एकान्त में करना चाहिए। अपने घर के मन्दिर में या किसी शान्त व पवित्र स्थान में आसन पर बैठकर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके ध्यान किया जा सकता है। ध्यान के लिए पद्मासन या सुखासन सबसे उत्तम हैं।

2-आंखें मूंदकर नाक के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर ध्यान करना चाहिए।

3-ध्यान के समय शरीर, गर्दन व रीढ़ की हड्डी सीधी रहनी चाहिए, कुबड़ाकर न बैठें।

4-ध्यान सच्ची लगन से नियमपूर्वक बिना उकताये हुए करना चाहिए।

5-ध्यान के लिए सबसे अच्छा समय उषाकाल या रात्रि का समय होता है क्योंकि उस समय बुद्धि सात्विक रहती है, किन्तु अन्य समय भी ध्यान किया जा सकता है।

6-भोजन के तुरन्त बाद ध्यान करने से मन एकाग्र नहीं होता, आलस्य आता है; अत: खाली पेट ध्यान करना चाहिए।

7-शुरु में ध्यान में यदि ध्येय (परमात्मा) में मन स्थिर न हो तो इष्टमन्त्र का जप करते हुए चित्त को ध्येय में लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार कुछ समय बाद ध्यान स्वत: होने लगता है, और ध्यान करते-करते साधक आनन्दमय ब्रह्म में एकाकार होते हुए दिव्य आनन्द को प्राप्त कर लेता है।

NOTE;-

यहाँ दिन के विभिन्न प्रहरों में भगवान श्रीकृष्ण के अलग-अलग स्वरूपों के ध्यान का वर्णन किया गया है।

भगवान श्रीकृष्ण प्रात: कालीन ध्यान;-

03 POINTS ;-

1-आंखें मूंदकर नाक के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर देखें कि एक कल्पवृक्ष के नीचे रत्ननिर्मित कमलपीठ पर इन्द्रनीलमणि के समान सुंदर बालकृष्ण विराजमान हैं। खिले हुए दुपहरिया के फूल के समान लाल रंग के उनके करारविन्द और चरणारविन्द हैं। उन्होंने वक्ष:स्थल पर सुन्दर आभूषण और बघनखा धारण किया है। केसर मिले चंदन से उनका श्रृंगार किया हुआ है।

2-काले-काले घुंघराले केश कपोलों पर गिरते हुए बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहे हैं। कमर में घुंघरुदार करधनी की लड़ बंधी हैं जिससे मधुर झनकार हो रही है। दाहिने हाथ में खीर व बांये हाथ में तुरन्त का निकाला हुआ मक्खन लिए बालकृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं। गौ, गोप और गोपियों की मंडली से घिरे बालकृष्ण की छवि मन को मोह ले रही है।

3-बालकृष्ण का असंख्य सूर्यों से बढ़कर तेज, असंख्य चन्द्रमाओं से बढ़कर शीतलता, असंख्य समुद्रों से बढ़कर गाम्भीर्य, असंख्य कुबेरों से बढ़कर ऐश्वर्य, असंख्य कामदेवों से बढ़कर सौन्दर्य, असंख्य अग्नियों से बढ़कर तेज, असंख्य पृथ्वियों से बढ़कर क्षमाशीलता व असंख्य प्रियतमों से बढ़कर उनका माधुर्य मेरे मन को अपनी ओर खींच रहा है। इस प्रकार बालकृष्ण की तेजोमयी मूर्ति मन में प्रकट कर स्वयं को उसमें विलीन कर दें।

भगवान श्रीकृष्ण मध्यकालीन कालीन ध्यान;-

02 POINTS ;-

1-आंखें बंदकर नाक के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर विचार करें कि यमुनातट पर वृन्दावन में कदम्बवृक्ष के नीचे पृथ्वी पर अपने चरण पर चरण रखे हुए भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उनका नीलवर्ण है, पीताम्बर धारण किए हैं, श्रीअंग में कर्पूर-चंदन का लेप लगा है, कपोलों पर गेरु से सुन्दर पत्ररचना की गयी है, कानों तक फैले विशाल नेत्र हैं, कानों में कुण्डल झिलमिला रहे हैं, मुख पर मधुर मुसकान छा रही है।

2-गोधूलि से धूसरित वक्ष:स्थल पर धारण किए हुए स्वर्ण आभूषणों से उसकी शोभा और भी बढ़ गई है। गुंजाओं से उन्होंने अपने अंगों को सजा रखा है, सिर पर भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। सुन्दर मयूरपिच्छ, वनमाला धारण किए भगवान श्रीकृष्ण कुंज के भीतर विराजमान होकर गोपों के साथ वन-भोजन कर रहे हैं। उनकी छवि से उदारता टपक रही है। इस छवि का ध्यान दोपहर के समय करना चाहिए।

भगवान श्रीकृष्ण सायंकालीन ध्यान;-

02 POINTS ;-

1-सायंकाल में आंखें बंदकर मन में ध्यान करें कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारकापुरी में एक सुन्दर भवन में कमल की आकृति वाले मणिमय सिंहासन पर विराजमान हैं। मुनियों के समूह ने उन्हें चारों ओर से घेर रखा है और भगवान उन्हें तत्वज्ञान दे रहे हैं।

2-भगवान की अंगकान्ति नीलकमल के समान है। नेत्र खिले कमलदल के समान व मुखारविन्द प्रसन्न हैं। वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिह्न व कौस्तुभमणि अपनी प्रभा बिखेर रही हैं। रेशमी पीताम्बर पहने वे चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हैं। चारों ओर प्रकाश छा रहा है और उसमें से आनन्द का अपार सागर उमड़ रहा है। धीरे-धीरे मैं भी उस आनन्दसमुद्र में विलीन होता जा रहा हूँ।

भगवान श्रीकृष्ण रात्रिकालीन ध्यान;-

04 POINTS ;-

1-सुखासन या पद्मासन में बैठकर नेत्र मूंदकर दृष्टि को नासिका के अग्रभाग में केन्द्रित कर देखें कि अमृतमयी चन्द्रकिरणों से प्रकाशित यमुना-पुलिन पर भगवान श्रीकृष्ण रासक्रीडा से थककर गोपांगनाओं की मण्डली के मध्य में विराजमान हैं। खिले हुए कुन्द, कल्हार, मालती, चमेली आदि पुष्पों के मकरन्द का पान करके भंवरे मधुर गुंजार कर रहे हैं।

2-ऐसे मनोहारी वातावरण में श्यामसुन्दर मन्द-मन्द मुस्कराते हुए मुरली बजा रहे हैं। माथे पर मोरपंख से सजा मुकुट व बंधी हुई केशों की चोटी श्यामल शरीर पर बहुत सुन्दर लग रही है। गले में वनपुष्पों का हार, करधनी, नूपुर व कंगन धारण किए हुए हैं। आभूषणों की मधुर झंकार से भगवान के अंग भी झंकारमय हो उठे हैं।

3-श्रीकृष्ण एक-दूसरी से अपनी बांहों को मिलाए नृत्य करने वाली गोपियों से घिरे हुए हैं।

रासधारी श्रीकृष्ण ने अपनी ऐश्वर्यशक्ति से बहुत-से दिव्य स्वरूप प्रकट कर लिए हैं और उन स्वरूपों से वे प्रत्येक दो गोपी के बीच में स्थित हैं।

4-इस प्रकार ध्यान में यह देखे कि मैं उन्हीं आनन्दमय परमात्मा श्रीकृष्ण में विलीन हो गया हूँ। ये श्रीकृष्ण मुझसे अलग नहीं हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण में आनन्द के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, जो है सो आनन्द ही है। श्रीकृष्ण की आनन्दमयी मूर्ति चित्त में प्रकट करके अपने को उसी में विलीन कर देना सर्वोत्तम ध्यान है। इस प्रकार का ध्यान करने से एक-न-एक दिन श्रीकृष्ण साधक को अपने स्वरूप की प्राप्ति अवश्य करा देंगे।

श्रीमदभगवत महापुराण में भगवान श्री कृष्ण ने उद्धवजी से कहा :-

शुद्ध व एकांत में बैठकर अनन्य प्रेम से ईश्वर का स्मरण करें और प्रार्थना करें कि 'हे प्रभु! प्रसन्न होइए! मेरे शरीर में प्रवेश करके मुझे बंधनमुक्त करें '। इस प्रकार प्रेम और भक्तिपूर्वक ईश्वर का भजन करने से वे भगवान भक्त के हृदय में आकर बैठ जाते हैं. भक्त को भगवान् का वह स्वरुप अपने हृदय में कुछ-कुछ दिखाई देने लगता है। इस स्वरुप को सदा हृदय में देखने का अभ्यास करना चाहिए। इस प्रकार सगुण स्वरुप के ध्यान से भगवान हृदय में विराजमान होते ही हृदय की सारी वासनाएं संस्कारों के साथ नष्ट हो जाती है और जब उस भक्त को परमात्मा का साक्षात्कार होता है तो उसके हृदय कि गांठ टूट जाती है और उसके सरे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और कर्म-वासनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती हैं।

.....SHIVOHAM....


Single post: Blog_Single_Post_Widget
bottom of page