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गुरु दत्तात्रेय जी के 24 गुरु'कौन'है?क्या भगवान दत्तात्रेय के नामजप से पितृदोष से रक्षा होत

  • Writer: Chida nanda
    Chida nanda
  • Jun 19, 2018
  • 11 min read

कौन है गुरु दत्तात्रेय?-

05 FACTS;-

1-एक समय सारे वेद नष्ट हो गए। वैदिक कर्मों एवं यज्ञ आदि का लोप हो गया। चारों वर्ण एक में मिल गए और सर्वत्र वर्णसंकरता फैल गई। धर्म शिथिल हो गया और अधर्म दिनों दिन बढ़़ऩे लगा। सत्य दब गया तथा सब ओर असत्य ने अपना सिक्का जमा लिया। प्रजा क्षीण होने लगी। ऐसे समय में अत्रि पत्नी अनुसूया से प्रकट होकर दत्तात्रेय जी ने यज्ञ और कर्मानुष्ठान की विधि सहित सम्पूर्ण वेदों का पुनरुद्धार किया और पुन: चारों वर्णों को पृथक-पृथक अपनी-अपनी मर्यादा में स्थापित किया।

2-दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसीलिए उन्हें परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु और श्रीगुरुदेवदत्त भी कहा जाता है। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया गया था।

2-भगवान दत्तात्रेय गुरु वंश के प्रथम गुरु , साधना करने वाले और योगी थे । इन्हे ब्रह्माजी के मानस पुत्र ऋषि अत्रि और अनुसूइया का पुत्र बताया गया हैं ।| इनके भाई चन्द्र देवता और

ऋषि दुर्वासा है।इन्होने जीवन में गुरु की महत्ता को बताया है।गुरु बिना न ज्ञान मिल सकता है ना ही भगवान ।हजारो सालो तक घोर तपस्या करके इन्होने परम ज्ञान की प्राप्ति की और वही ज्ञान अपने शिष्यों में बाँटकर इसी परम्परा को आगे बढाया ।

3-गुरु दत्तात्रेय ने हर छोटी बड़ी चीज से ज्ञान प्राप्त किया। माउन्ट आबू के गुरु शिखर पर्वत को दत्तात्रेय की तपोभूमि के रूप में जाना जाता है जहा आज भी पहाड़ की ऊंचाई पर इनका मंदिर स्थापित है।मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को दत्तात्रेय जयंती मनाई जाती है। शास्त्रानुसार इस तिथि को भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था ।

4-तंत्र से जुड़े होने के कारण दत्तात्रेय को नाथ परंपरा और संप्रदाय का अग्रज माना जाता है। इस नाथ संप्रदाय की भविष्य में अनेक शाखाएं निर्मित हुईं। भगवान दत्तात्रेय को नवनाथ संप्रदाय से संबोधित किया गया है।उनके शिष्यों में भगवान परशुराम का भी नाम लिया जाता है। तीन धर्म (वैष्णव, शैव और शाक्त) के संगम स्थल के रूप में त्रिपुरा में उन्होंने लोगों को शिक्षा-दीक्षा दी।

5-पुराणों के अनुसार इनके तीन मुख, छह हाथ वाला त्रिदेवमयस्वरूप है। चित्र में इनके पीछे एक गाय तथा इनके आगे चार कुत्ते दिखाई देते हैं। औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है। विभिन्न मठ, आश्रम और मंदिरों में इनके इसी प्रकार के चित्र का दर्शन होता है। भगवान दत्तात्रेय के चित्र से उनका अद्भुत संतुलनकारी व्यक्तित्व प्रकट होता है।

भगवान दत्तात्रेय ने किसे गुरु बनाया ?-

13 FACTS;-

1-भगवान दत्तात्रेय ने जीवन में कई लोगों से शिक्षा ली। दत्तात्रेय ने अन्य पशुओं के जीवन और उनके कार्यकलापों से भी शिक्षा ग्रहण की। दत्तात्रेयजी कहते हैं कि'' जिससे जितना-जितना गुण मिला है, उनको उन गुणों को प्रदाता मानकर मैंने उन्हें अपना गुरु माना है। इस प्रकार मेरे 24 गुरु हैं। ''

2-इन्होने अपने जीवन में मुख्यत 24 गुरु बनाये जो कीट पतंग जानवर इंसान आदि थे |

सिद्ध योगियों के अधिराज महर्षि दत्तात्रेय को बहुत बड़ी मात्रा में ज्ञान की आवश्यकता थी। वे मनोविज्ञान शास्त्र के धुरन्धर पंडित थे, इसलिये जानते थे कि किसी भी ज्ञान को जान लेने मात्र से वह मन की गहरी भूमिका में उतर कर संस्कारों का रूप धारण नहीं कर सकता। मन को सच्ची शिक्षा देने के लिये अनेक साधनों की आवश्यकता होती है, इनमें सबसे बड़ा साधन गुरु है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। दत्तात्रेय विचार करने लगे-किसे गुरु बनाना चाहिए ..

3-वे बहुत से योगी संन्यासियों को जानते थे, अनेक विद्वानों से उनका परिचय था, सैंकड़ों सिद्ध उनके मित्र थे। तीनों लोकों में एक भी तत्वदर्शी ऐसा न था, जो उन्हें जानता न हो और यदि वे उससे ज्ञान सीखने जाते, तो मना कर देने की क्षमता रखता हो। इनमें से किसके पास ज्ञान पाने जावें, इस प्रश्न पर बहुत दिनों तक वे सोचते रहे, पर कोई ठीक निर्णय न कर सके। वे सर्वगुण सम्पन्न गुरु से दीक्षा लेना चाहते थे, पर वैसा कहीं भी कोई उन्हें दिखाई न पड़ रहा था। मनुष्य-शरीर त्रुटियों का भण्डार है। जिसे देखिये, उसमें कुछ न कुछ त्रुटि मिल जायेगी। पूर्णतः निर्दोष तो परमात्मा है। जीवित मनुष्य ऐसा नहीं देखा जाता।

4-दत्तात्रेय जब सर्वगुण सम्पन्न गुरु न चुन सके तो उनके हृदयाकाश में आकाशवाणी हुई। मन को आत्मा का दिव्य संदेश आया कि ऋषि, मूर्ख मत बनो! पूर्णतः निर्दोष और पूर्ण ज्ञानवान व्यक्ति तुम तीनों लोकों में ढूँढ़ नहीं सकते, इसलिये अपने में सच्चा शिष्यत्व पैदा करो। जिज्ञासा, श्रद्धा और विश्वास से अपने हृदय में पात्रता उत्पन्न करो, फिर तुम्हें गुरुओं का अभाव न रहेगा। दत्तात्रेय के नेत्र खुल गये, उनकी सारी समस्या हल हो गई। ज्ञान-लाभ करने का जो एक मात्र रहस्य है, वह उन्हें आकाशवाणी ने अनायास ही समझा दिया।

5-ऋषि का मस्तक श्रद्धा से नत हो गया। उन्होंने दूसरों के अवगुणों को देखना बन्द कर दिया और ज्ञान एवं पवित्रता की दृष्टि से ही संसार को देखने लगे। शिष्य की भावना उनके मानस-लोक में लहलहाने लगी। उन्हें गुरुओं के तलाश करने में जो कठिनाई प्रतीत हो रही थी, वह अब बिलकुल न रही। अपना मनोरथ पूरा करने के लिये-ज्ञान लाभ की इच्छा से वे उत्तर दिशा की ओर चल दिये।

6-घर से निकलते ही उन्होंने देखा कि अन्तरिक्ष तक विशाल भूमण्डल फैला हुआ है। वे सोचने लगे, यह पृथ्वी माता कितनी क्षमाशील है। स्वयं पद-दलित होती हुई भी समस्त जीव-जन्तुओं को सब प्रकार की सुविधाएं देती रहती है, ऐसी परोपकारिणी पृथ्वी मेरी गुरु है। इससे मैंने क्षमा का गुण सीखा। हे पृथ्वी! मैं तुझे नमस्कार करता हूँ, तेरा शिष्य हूँ।

7-आगे चलकर उन्होंने पर्वत देखा। वह अपने प्रदेश में अनेक प्रकार के वृक्ष, धातुएं, रत्न, नदी-नद उत्पन्न करता था और उस समस्त उत्पादन को लोक-सेवा के लिये निःस्वार्थ भाव से दूसरों को दे देता था। ऐसे उदार, परोपकारी से उपकार का गुण सीखते हुए ऋषि ने उसे भी अपना गुरु बना लिया।

8-कुछ दूर और चलने पर उन्हें एक विशाल वृक्ष दिखाई पड़ा। यह वृक्ष धूप, शीत को सहन करता हुआ एकाग्र भाव से खड़ा था और अपनी छाया में असंख्य प्राणियों को आश्रय दे रहा

था।पत्थर मारने वालों को फल देना इसका स्वभाव था। ऋषि ने कहा- हे उदार वृक्ष, तू धन्य है! मैं तुझे गुरु बनाता हुआ प्रणाम करता हूँ।

9-वृक्ष को छोड़कर आगे चले, तो शीतल सुगन्धित वायु ने उनका ध्यान आकर्षित किया। वे सोचने लगे-यह पवन क्षण भर भी बिना विश्राम लिये प्राणियों की जीवन-यात्रा के लिये बहता रहता है। अपने पोषक द्रव्य उन्हें देता है और उनकी दुर्गन्धियों को अपने में ले लेता हैं इसी के आधार पर समस्त जीव जीवित हैं, तो भी यह कितना निरभिमान और कर्त्तव्य-परायण है। ऋषि ने शिष्य-भाव से वायु को भी नमस्कार किया।

10-आकाश, जल और अग्नि की उपयोगिता पर उन्होंने ध्यान दिया, तो उनके मन में बड़ी श्रद्धा उपजी। यह तत्व जड़ होते हुए भी चैतन्य मनुष्य की अपेक्षा कितने तपस्वी, कर्मवीर, परोपकारी और त्यागी है। इनका जीवन एकमात्र उपकार के लिये ही तो लगा हुआ है। दत्तात्रेय ने इन तीनों को भी गुरु बना लिया।

11-अब उनकी निगाह सूर्य और चन्द्रमा पर गई। यह अपने प्रकाश से विश्व की कितनी आवश्यकताएं पूर्ण करते हैं। बेचारे स्वयं दिन-रात घूम-घूम कर दूसरों के लिये प्रकाश, गर्मी और शीतलता जैसी अमूल्य वस्तुएं उनके स्थानों पर ही बाँटते रहते हैं। वे इस बात की भी प्रतीक्षा नहीं करते कि कोई हमारे पास हमारी सम्पदा को माँगने आवे, तब उसे दान दें। बिना माँगे ही उनका अक्षय सदावर्त सबके घर पर पहुँचता रहता है। ऋषि ने उन्हें भी अपना गुरु मान लिया।

12-पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष, वायु, अग्नि, जल, आकाश, सूर्य और चन्द्र को गुरु बनाने के बाद वे एक स्थान पर बैठ कर सुस्ता रहे थे कि उन्होंने देखा, सामने एक पेड़ की डाल पर एक चिड़िया अपने बच्चों की मृत्यु से दुःखी होकर प्राण त्याग रही है। जब वह मर गई, तो उसके पति ने भी प्राण त्याग दिये। ऋषि ने सोचा कि साँसारिक पदार्थों पर, धन-संतान पर अत्यधिक मोह करने का परिणाम मृत्यु जैसी वेदना को सहन करना है। उन्हें लगता कि मृत पक्षी मुझे उपदेश कर रहे हैं कि- “संसार के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करना चाहिए, पर उससे झूठा ममत्व बाँध लेने पर बड़ी दुर्गति होती है।” ऋषि ने उस होला नामक पक्षी की शिक्षा स्वीकार की और उस मृतक पक्षी को गुरु बना लिया।

13-पक्षी की दीक्षा पर वे मनन कर रहे थे कि पास के बिल में एक अजगर सर्प बैठा हुआ दिखाई दिया। वह भारी शरीर के कारण अधिक दौड़-धूप करने में असमर्थ था, इसलिए उसे अक्सर भूखा रहना पड़ता था। जो कुछ थोड़ा-बहुत मिल जाता, उसी से सन्तोष कर लेता अजगर की ओर ध्यान से देखा तो दत्तात्रेय के मन में ऐसे विचार उठे-मानो यह मेरी ओर मुँह करके कह रहा है कि परिस्थितियों के कारण जब हम असमर्थ हों, तो थोड़े में ही संतोष कर लें और न मिलने वाली वस्तु के लिये दुःख करें। दत्तात्रेय ने उसे भी गुरु-भाव से अभिवादन किया।

भगवान दत्तात्रेय के २४ गुरु;-

(1) पृथ्वी;-

धूप, शीत, वर्षा को धैर्यपूर्वक सहन करने वाली, लोगों द्वारा मल-मूत्र त्यागने व पदाघात आदि पर भी क्रोध न करने वाली, अपनी कक्ष और मर्यादा पर निरंतर नियत गति से घूमने वाली सदैव कर्तव्य परायण पृथ्वी को मैंने अपना प्रथम गुरु माना और उनसे इन सद्गुणों को सीखा।

(2) पवन;-

कभी अचल न होकर बैठना, निरंतर गतिशील रहना, संतप्तों को सांत्वना देना, गंध को वहन करना पर स्वयं निर्लिप्त रहना- ये विशेषताएं पवन में पाईं और उन्हें सीखकर उसे गुरु माना।

(3) आकाश;-

अनंत विशाल होते हुए भी अनेक ब्रह्मांडों को अपनी गोद में भरे रहने वाले, ऐश्वर्यवान रहते हुए भी रंच मात्र अभिमान न करने वाले आकाश का गुण मुझे बहुत प्रिय लगा। इन गुणों को आचरण में लाने का प्रयत्न करते हुए मैंने उसे गुरु वरण किया।

(4) जल;-

सबको शुद्ध बनाना, सदा सरल और तरल रहना, आतप को शीतलता में परिवर्तित कर देना, वृक्ष-वनस्पतियों तक को जीवन दान करना आदि महानताएं जल में देखीं तो उसे गुरु मानना ही उचित समझा।

(5) यम;-

अनुपयोगी को हटा देना, अभिवृद्धि पर नियंत्रण रखना, संसार यात्रा से थके हुओं को विश्राम देने के कार्य में संलग्न यम को पाया तो उसे भी गुरु बना लिया।

(6) अग्नि;-

निरंतर प्रकाशमान, ऊर्ध्वमुख, संग्रह से दूर रहने वाली, स्पर्श करने वालों को अपना ही रूप बना लेने वाली, समीप रहने वालों को भी प्रभावित करने वाली अग्रि मुझे आदर्श लगी, अत: उसे गुरु वरण किया।

(7) चन्द्रमा;-

अपने पास प्रकाश न रहने पर भी सूर्य से याचना करके पृथ्वी को चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी चंद्रमा मुझे सराहनीय लोक सेवक लगा। विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश न होकर न बैठना और फिर आगे बढऩे का साहस बार-बार करते रहना, धैर्यवान चंद्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है- यह देखकर उसे मैंने गुरु बनाया।

(8) सूर्य;-

नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरंतर करते रहना, स्वयं प्रकाशित होना और दूसरों को प्रकाशित करना सूर्य का गुण देखकर उन्हें गुरु माना।

(9) कबूतर;-

पेड़ के नीचे बिछे हुए जाल में पड़े दाने देखकर लालची कबूतर आलस्यवश अन्यत्र न गया और उतावली में बिना कुछ सोचे-विचारे ललचाया और जाल में फंस कर अपने प्राण गंवा बैठा। उसे गुरु मानकर शिक्षा ग्रहण की कि लोभ और अविवेक से किस प्रकार पतन होता है।

(10) अजगर;-

शीतकाल में अंग जकड़ जाने के कारण भूखा अजगर मिट्टी खाकर दुर्दिन को सहन करता था, उसकी इस सहनशीलता ने मुझे अपना अनुयायी और शिष्य बना लिया।

(11) समुद्र;-

अपनी मर्यादा से आगे न बढऩे वाला, स्वयं खारा होने पर भी बादलों को मधुर जल दान करने वाले समुद्र को गुरु कैसे न मानता।

(12) पतंगा;-

लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्राणों की परवाह न करके सदैव अग्रसर होने वाला पतंगा अपनी निष्ठा से गुरु बन मुझे शिक्षा दे रहा था।

(13) मधु मक्खी;-

पुष्पों का मधुर संचय करके दूसरों के लिए समर्पण करने की जीवन साधना में लगी हुई मधुमक्खी मुझे शिक्षा दे रही थी कि मनुष्य स्वार्थी नहीं, परमार्थी बने।

(14) भौंरा;-

आसक्त प्राणी किस प्रकार अपने प्राण गंवाता है यह शिक्षा अपने गुरु भौंरा से सीखी और गांठ बांध ली।

(15) हाथी;-

कामातुर हाथी किस प्रकार बंधन में बंध गया, यह देखकर मैंने वासना के दुष्परिणामों को समझा और उसे गुरु माना।

(16) मृग, मछली;-

कानों के विषयों में आसक्त मृग की बधिकों द्वारा पकड़े जाते और जिह्वा की लोलुप मछली को कछुआरे के जाल में तड़पते देखा तो उनसे भी शिक्षा ग्रहण की।

(17) वेश्या;-

सद्गृहस्थ का आनंद और पतिव्रत धर्म द्वारा परलोक साधन का व्यवहार गंवा कर पश्चाताप से दूसरों को सावधानी का संदेश देने वाली पिंगला वेश्या भी मेरे गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुई।

(18) काक;-

काक पक्षी ने मुझे सिखाया कि धूर्तता और स्वार्थपरता की नीति अंत में हानिकारक होती है। अत: वह भी मेरा गुरु ही है।

(19) अबोध बालक;-

राग द्वेष, चिंता, काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुणों से रहित अबोध बालक कितना सुखी और शांत रहता है, उसके समान बनने के लिए बच्चे को अपना आदर्श माना तथा उसे भी गुरु कहा।

(20) धान कूटती स्त्री;-

एक स्त्री चूडिय़ां पहने धान कूट रही थी। चूडिय़ां आपस में खनकती थीं। घर आए मेहमानों को इस बात का पता न लगे, इसलिए उसने एक-एक करके हाथों की चूडिय़ां उतार दीं और एक-एक ही रहने दीं। उससे मैंने सीखा कि अनेक कामनाओं के रहते चूडिय़ों की तरह मन में संघर्ष होते रहते हैं पर यदि एक ही लक्ष्य नियत कर लिया जाए तो सभी उद्वेग शांत हो जाएं।

(21) लोहार;-

लोहार अपनी भट्ठी में लोहे के टूटे-फूटे टुकड़ों को गर्म करके हथौड़े की चोट से कई तरह का सामान बना रहा था, उसे देखकर सीखा कि निरुपयोगी और कठोर प्रतीत होने वाले मनुष्य भी यदि अपने को तपाने और चोट सहने की तैयारी कर लें तो उपयोगी उपकरण बन सकते हैं।

(22) सर्प;-

सर्प दूसरों को कष्ट देता और प्रत्युतत्तर में सब ओर से त्रास पाता है। उसने मुझे सिखाया कि उद्दण्ड, क्रोधी, आक्रामक और आततायी होना किसी के लिए भी श्रेयस्कर नहीं है।

(23) मकड़ी;-

मकड़ी की क्रिया को देखकर मुझे सूझा कि अपनी दुनिया हर मनुष्य अपनी भावना के अनुरूप ही गढ़ता है।

(24) भृंगज;-

भृंगज कीड़ा एक झींगुर को पकड़कर लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने समान बना लिया। यह देखकर मैंने सोचा कि एकाग्रता और तन्मयता के द्वारा मनुष्य अपना शारीरिक और मानसिक कायाकल्प कर डालने में भी सफल हो सकता है।विवेकशील

व्यक्ति सामान्य वस्तुओं और घटनाओं से भी शिक्षा ग्रहण करते हैंऔर अपने जीवन में धारण करते हैं। अतएव उनका विवेक बढ़ता जाता है, यह विवेक ही सब सिद्धियों का मूल कारण है। अविवेकी लोग तो ब्रह्मा के समान गुरु को भी पाकर कुछ लाभ उठा नहीं सकते।

भगवान दत्तात्रेय के नामजप से पितृदोष से रक्षा कैसे होती है ?-

09 FACTS;-

1-केवल सनातन हिन्दू धर्म मे ही पुनर्जन्म की अवधारणा है, जिस जीव ने जन्म लिया है ,वो अवश्य ही दूसरा जन्म लेगा...किन्तु यदि मृत्यु पूर्व जीव की कोई इच्छा रह गई हो , कोई पापकर्म रहा हो अथवा अकाल मृत्यु हुई हो ...ऐसे मे उस जीव की आत्मा का पुनर्जन्म नहीं हो पाता और आत्मा संतुष्टि के अभाव मे भटकती रहती है ,जिससे उस आत्मा के वंशजों पर बुरा प्रभाव पड़ता है , जिसे हम ‘ पित्रदोष ‘ कहते हैं ।

2-शास्त्रों के अनुसार हमारे मृत पूर्वजों और परिवार जनों को पितृ देवता माना जाता है।पितृ देवता की कृपा के बिना किसी भी व्यक्ति को सुख प्राप्त नहीं हो सकता है।ज्योतिषशास्त्र में कई प्रकार के दोषों के बारे में बताया गया है।इनमें पितृदोष भी एक है।अधिकांश लोग साधना नहीं करते । अतएव वे माया में अत्यधिक लिप्त होते हैं । इसलिए मृत्यु के उपरांत ऐसे व्यक्तियों की लिंगदेह अतृप्त रहती है । ऐसे अतृप्त लिंगदेह मृत्युलोक में अटक जाते हैं ।

3-मृत्युलोक भूलोक एवं भुवर्लोक के मध्य है । दत्त के नामजप के कारण मृत्युलोक में अटके पूर्वजों को गति मिलती है और वे अपने कर्म के अनुसार आगे के लोक में जाते हैं । इससे स्वाभाविक रूप से उनसे व्यक्ति को होनेवाले कष्ट की तीव्रता घट जाती है ।दत्त के नामजप से निर्मित शक्ति से नामजप करनेवाले के सर्व ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है।

4-कोई व्यक्ति जब ‘श्री गुरुदेव दत्त ।’ यह नामजप करता है, उस समय जिस पितर में, अगले लोकों में जाने की तीव्र इच्छा होती है, उस पितर को इस नामजप से सर्वाधिक लाभ होता है । अधिकतर पूर्वज नामजप करनेवाले उत्तराधिकारी को ही लक्ष्य बनाते हैं । इसका कारण इस प्रकार है – ‘मेरी आध्यात्मिक प्रगति हो’, यह इच्छा करनेवाले पितर साधना करनेवाले वंशजसे सहायता लेते हैं, तो जिन पितरों की इच्छा भौतिक विषयों से (खाना-पीना आदिसे) संबंधित होती है, वे पितर उसी प्रकार की वासनावाले अपने वंशज से सहायता लेते हैं ।

5-तीनों ईश्वरीय शक्तियों से समाहित भगवान दत्तात्रेय सर्वव्यापी हैं।उनकी उपासना से मनुष्य को बुद्धि, ज्ञान और बल की प्राप्ति होती है।शत्रु बाधा दूर करने में भी उनके मंत्र कारगर है।गुरुवार, पूर्णिमा अथवा दत्तात्रेय जयंती के दिन निम्न मंत्रों का उच्चारण करने से मनुष्य के कष्ट जल्दी ही दूर हो जाते हैं।

6-1-दत्तात्रेय का महामंत्र; - 'दिगंबरा-दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा'

6-2-तांत्रोक्त दत्तात्रेय मंत्र; -

'ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नम:'

6-3-दत्त गायत्री मंत्र; -

'ॐ दिगंबराय विद्महे योगीश्रारय् धीमही तन्नो दत: प्रचोदयात'

7-ये वो मंत्र हैं, जिनका निरंतर जाप करने से मनुष्य के जीवन के सिर्फ कष्ट ही दूर नहीं होते, बल्कि अगर आप पितृ दोष के कारण परेशान है तो उनका भी समाधान तुरंत हो जाता है और पितृ देव की कृपा प्राप्त होने लगती है।

दत्तात्रेय देवतासे भावपूर्ण प्रार्थना कुछ इस प्रकार करें -“ हे दत्तात्रेय देवता, जो भी पितर मेरे परिवार के परूष वर्गके जीवीकोपार्जन के मार्ग में बाधा निर्माण कर रहे हैं, उनसे आप हमारा रक्षण करें, हमारे परिवार के सभी सदस्यों के चारों ओर अभेद्य सुरक्षा कवच निर्माण होने दें ... अपनी कृपादृष्टि हमपर बनाए रखें, हम आपके शरणागत हैं”।

8-यह प्रार्थना जप के साथ-साथ आप दिन में जितनी अधिक बार कर सकते हैं, करें।वैसे तो श्राद्धपक्ष के दिनों में 72 माला प्रतिदिन का विधान है , किन्तु जितना अधिक जप हो सके , कीजिये।

9-भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है और तीनो ईश्वरीय शक्तियों से समाहित महाराज दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफल और जल्दी से फल देने वाली है। महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी, अवधूत और दिगम्बर रहे थे। वे सर्वव्यापी है और किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी से भक्त की सुध लेने वाले हैं, अगर मानसिक, या कर्म से या वाणी से महाराज दत्तात्रेय की उपासना की जाये तो भक्त किसी भी कठिनाई से शीघ्र दूर हो जाते हैं।

....SHIVOHAM....


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