शिव संहिता के अनुसार ज्ञानी समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है।क्या ये संभव है ?
- Chida nanda
- Jul 4, 2018
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वास्तिविक ज्ञान क्या है ;- 09 FACTS;- 1-केवल एक ज्ञान ही नित्य और आदि अन्त से रहित है। जगत में ज्ञान से भिन्न कोई अन्य वस्तु विद्यमान नहीं है। इंद्रियों की उपाधि के द्वारा जो कुछ पृथक-पृथक प्रतीत होता है, वह केवल ज्ञान की भिन्नता के कारण ही प्रतीत होता है। भक्तों पर कृपा करने के उद्देश्य से मैंने (शिव जी)यह योग का अनुशासन कहा है। सब भूतों की आत्मा मुक्तिदायक है। यह इस शास्त्र का लक्ष्य है जो मत विवादमय और दुर्ज्ञान के कारणरूप है, उनका त्याग करके आत्मज्ञान का आश्रय लें, यही भूतों की अनन्य गति है। 2-कोई विद्वान सत्य की प्रशंसा करते हैं तो कोई तपस्या की और कोई शुद्ध आचार को ही श्रेष्ठ बताते हैं। कोई क्षमा को उचित मानते हैं तो कोई सब में समान भाव रखना ही ठीक बताते हैं। कोई सरलता का अनुमोदन करते हैं तो कोई दान की ही प्रशंसा किया करते हैं। कोई पितर कर्म (तर्पणादि) की महत्ता स्वीकार करते हैं । कोई कर्म अर्थात सगुण उपासना को ही मान्यता देते हैं। कुछों के मत में वैराग्य ही श्रेष्ठ है। 3-कोई विद्वान पुरुष गृहस्थ धर्म को प्रशंसनीय कहते हैं तो कोई परमज्ञानी अग्निहोत्र आदि कर्मों को ही प्रशस्त मानते हैं। किसी के मत में मंत्र योग ही श्रेष्ठ है और किसी के विचार में तीर्थ यात्रा आदि करना या तीर्थसेवन करना ही श्रेष्ठ है। इस प्रकार अनेकानेक विद्वानों ने संसार सागर से मुक्त होने के लिए अपनी-अपनी मति के अनुसार अनेक उपाय बताए हैं। 4-इस प्रकार कृत्य और अकृत्य अर्थात विधि-निषेध कर्मों के ज्ञाता पुरुष पाप कर्मों से विमुक्त रहकर भी व्यामोह में ही पड़े रहते हैं तथा पाप-पुण्य के अनुष्ठान रूप उपयुक्त मतों के आश्रय में रहते हैं। परिणामस्वरूप अनुष्ठाता को जन्म-मरण के चक्र में बार-बार घूमते रहना होता है। इसका तात्पर्य यह है कि शुभ कर्मों के करने से चित्त की शुद्धि तो संभव है, परंतु मुक्ति मिल जाना संभव नहीं है। 5-कुछ विद्वान गोपनीय शास्त्रों के अध्ययन में तत्पर रहना श्रेष्ठ बताते हैं। अनेकों का कहना है कि आत्मा नित्य और सर्वज्ञ गमन करने में समर्थ है। कुछ भी सत्य नहीं हैं। वे अपने दृढ़ चित्त से यही कहते हैं कि स्वर्गादि लोक हैं ही कहां? अर्थात स्वर्गादि लोक कहीं है ही नहीं। 6-कुछ विद्वानों का मत है कि जो कुछ भी है, वह ज्ञान का प्रवाह ही है अर्थात संसार की सब दृश्यमान वस्तुएं ज्ञान के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। किसी किसी का निश्चय है कि जो कुछ है, वह शून्य ही है(यह शून्यवादियों का मत है) इसी प्रकार कुछ लोगों के विचार में प्रकृति और पुरुष दो ही तत्त्व हैं। 7-जो परमार्थ के विरुद्ध है उनकी मति तो और भी भिन्न है। इस प्रकार अपनी अपनी मति के अनुसार मान्यता बनाए हुए लोग कर्मों में लगे रहते हैं। किन्हीं का कहना है कि ईश्वर है ही नहीं और किन्हीं का कहना है कि यह जगत प्रपंच ईश्वरमय ही है। इस भांति अनेक विद्वान अनेक भेदों का वर्णन करते हैं और अपने मत में दृढ़ता पूर्वक तत्पर रहते हैं अर्थात वे किसी अन्य मत की कोई बात भी सुनना चाहते । 8-इस प्रकार अनेक मनुष्यों ने विभिन्न नाम वाले और पृथक पृथक विधि विधान वाले विविध मतों को लेकर शास्त्रों की रचना कर डाली है। परंतु ऐसे सभी शास्त्र लोकों को व्यामोह में डालने वाले हैं। अर्थात उन भिन्न भिन्न मत के शास्त्रों को पढ़ने से भ्रम उत्पन्न हो जाता है और साधक कुछ निश्चय करने में असमर्थ रहता है जिसके कारण जीवन समाप्त होने तक भी चित्त में भ्रांति बनी रहती है। परंतु ऐसे विवादशील पुरुषों का मत कहने की शक्ति हममें नहीं है, जिससे कि मनुष्य मुक्ति मार्ग को छोड़कर भवचक्र में ही भ्रमण करते रहते हैं। 9-सभी शास्त्रों का अवलोकन करके उन पर पुनः पुनः विचार करके यही निश्चय होता है कि एक मात्र यही योग शास्त्र परममत रूप एवं श्रेष्ठ है। इसकी ठीक प्रकार से रचना हुई है। इसको जानने के लिए अवश्य ही परिश्रम करना चाहिए। क्योंकि (जब अन्य शास्त्र निरर्थक ही हैं तब) उनका ज्ञान प्राप्त करने का प्रयोजन ही क्या है? कर्मकांड का महात्म्य;- 04 FACTS;- 1-शिव जी कहते हैं कि मेरे द्वारा कहा गया यह योगशास्त्र गोपनीय है,इसलिए इसे तीनों लोकों में से केवल उसी को देना चाहिए,जो कि महात्मा और श्रेष्ठ भक्त हो। 2-द के दो मत हैं-कर्मकांड और ज्ञानकांड। उनमें कर्मकांड और ज्ञानकांड दोनों के भी दो-दो भेद माने गए हैं। कर्मकांड के दो भागों को निषेध और विधि के नाम से जाना जाता है। निषेध कर्म के करने से अवश्य ही पाप होता है और विधि कर्म के कारण निश्चित रूप से पुण्य होता है। 3-विधि कर्म नित्य,नैमित्तिक और सकाम के भेद से तीन प्रकार के होते हैं। नित्यकर्म अर्थात देव-पूजन, संध्या आदि इसके न करने से पाप होता है। सकाम कर्मफल की इच्छा से किया जाता है और नैमित्तिक कर्म अर्थात पर्व काल में तीर्थ आदि के पुण्यजलों में स्नान दान आदि है, जिसके करने से पुण्य अर्जित होता है। 4-दो प्रकार का फल माना जाता है। स्वर्ग और नरक। स्वर्ग और नरक दोनों ही अनेक प्रकार के होते हैं। पुण्य कर्म करने वाले को स्वर्ग और पाप कर्म करने वाले को नरक की प्राप्ति होती है। यह सृष्टि निश्चय ही कर्मबंधन से युक्त है, इसे अन्यथा नहीं समझना चाहिए। सृष्टि के कर्म बंधन का तात्पर्य यह है कि संसार में आकर मनुष्य जो कुछ कर्म या अकर्म करता है,जब तक उनके फल का भोग नहीं किया जाता और जब तक किंचित भी कर्म शेष रहता है,तब तक संसार के बंधन से छुटकारा नहीं मिलता। पुण्य और पाप;- 05 FACTS;- 1-स्वर्ग में जीव को अनेक प्रकार के सुखों का अनुभव प्राप्त होता है और इसी प्रकार नरक में उसे अनेक प्रकार के दुःसहनीय दुखों को भोगना होता है। पाप कर्मों के करने से दुःख की और पुण्य कर्मों का करने से सुख की प्राप्ति है, इसलिए हमेशा पुण्य कर्म करने के लिए प्रयास करना चाहिए। 2-जैसे पाप का फल भोग लेने पर जीव को पुनः संसार में जन्म लेना होता है, वैसे ही पुण्य का फल भोगने पर भी पुनर्जन्म ग्रहण करना होता है। ऐसा अवश्य होता है, इसमें अन्यथा नहीं समझना चाहिए। 3-स्वर्ग भी निश्चय ही दुःख का स्थान है, क्यों कि वहां परस्त्री का दर्शन (अप्सरा आदि का भोग) मिलता है, जिससे रागद्वेष ईर्ष्या आदि एवं इच्छित स्त्री के न मिलने से मानसिक व्यथा उत्पन्न होना स्वाभाविक है और यह सब दुःख रूप ही है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। 4-मेधावी जनों ने पुण्य और पाप के रूप में दो प्रकार के कर्म कल्पित किए हैं। उन्हीं पाप-पुण्य रूपी कर्मों से शरीर बंधा हुआ है, जिससे कि जीव को बार-बार जन्म ग्रहण करना पड़ता है। इस लोक और परलोक के फल की कामना का और नित्य,नैमित्तिक आदि सभी कर्मों के फलों की आकांक्षा का त्याग करके मुमुक्षु पुरुष को योगाभ्यास में प्रवृत्त होना चाहिए। 5-योगी साधक के लिए आवश्यक है कि वह कर्मकांड के महात्म्य को जान लेने के पश्चात पुण्य और पाप दोनों प्रकार के कर्मों को छोड़ कर ज्ञानकांड में प्रवृत्त हो जाए। श्रुति का वचन है कि अरे, आत्मा ही सुनने के योग्य है, आत्मा ही मनन करने के योग्य है। आत्मा ही मुक्ति को देने वाली और सभी को उत्पन्न करने वाली है। इसलिए, प्रयत्नपूर्वक आत्मा का सेवन करें। क्या मनन करने योग्य केवल आत्मा ही है? 18 FACTS;- 1-जो चित्तवृत्ति बुद्धि को पाप और पुण्य दोनों में ही समान रूप से पे्ररित करती है, ‘वह मैं हूं’(शिव जी) मुझसे ही इस संपूर्ण चराचर रूप जगत की उत्पत्ति होती है। यह संपूर्ण दृश्यमान प्रपंच मैं ही हूं, यह सब (मुझसे ही उत्पन्न होना और) मुझमें ही लीन हो जाता है। न वह मुझसे भिन्न है और न मैं उससे भिन्न हूं। इस प्रकार मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है। अभिप्राय यह है कि संसार की ऐसी मान्यता रखनी चाहिए। 2-जिस प्रकार जल से परिपूर्ण मृत्तिका पात्र में एक ही सूर्य के अनेक प्रतिबिंब प्रतीत होते हैं,परंतु यथार्थ में वे अनेक नहीं होते,वरन् उनमें अनेकता का प्रतीति होती है। वैसे ही यह जगत भी एक ही परमसत्ता की अभिव्यक्ति है। एक सत्ता के अनेक रूपों में अभिव्यक्त होने के कारण ही हमको विविधता का बोध होता है। यह विविधता एक भ्रम है,सभी में एक ही प्रेरक शक्ति विद्यमान है। 3-जिस प्रकार स्वप्नावस्था में एक से ही अनेक प्रकार की कल्पना होती है, परंतु निद्रा के भंग होने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार जगत के अनेक रूपों की प्र्र्र्र्र्रतीति माया के आवरण से ही होती है। फिर जब वह माया दूर हो जाती है, तब जगत का अनेकत्व दूर होकर एकमात्र शुद्ध ब्रह्म ही रह जाता है। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति अथवा सीप में रजत की भ्रांति होने लगती है,वैसे ही परमात्मा में माया के आवरण से इस विश्व की भ्रांति होता है। 4-परंतु जब रस्सी का ज्ञान हो जाता है, तब सर्प की मिथ्या बुद्धि नहीं रहती, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर यह मिथ्याभूत जगत भी नहीं रहता। इसी प्रकार जब यह ज्ञान हो जाता यह सीप है, तभी उसके रजत होने का भ्रम दूर हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान के उत्पन्न होने पर जगत की भ्रांति समाप्त हो जाती है। 5-जैसे रस्सी में सर्प की भ्रांति होती है, वैसे ही जगत में भी भेद की प्रतीति होती है, अर्थात् जगत की भिन्नता रूपी भ्रांति रज्जु में सर्प भ्रांति के ही समान है- संसार की यह कल्पना अभ्यास मात्र ही है, इसमें यथार्थता किंचित् भी नहीं है। आत्मज्ञान होते ही मिथ्या संसार और विभिन्न प्रकार के भेद तिरोहित हो जाते हैं। 6-जिस प्रकार पित्तादि वे दूषित होने से पांडु रोग होकर निश्चय ही पीलापन प्रतीत होता है, वैसे ही ज्ञान रूप दोष के कारण आत्मा भी मिथ्या जगत के रूप से दिखाई देने लगता है। वह अज्ञान सरलता से दूर नहीं हो पाता।परंतु जब वह दूर हो जाता है, तब (पित्तादि दोषों के दूर होने पर) रोगी का पीलापन मिट कर शुक्ल रूप दिखाई देने के समान ही शुद्ध ब्रह्म का अनुभव होने लगता है। (इसीप्रकार अज्ञान भी रोग के समान है, जो कि आत्मज्ञान रूपी औषध के द्वारा ही नष्ट हो सकता है)। 7-जैसे कि त्रिकाल में भी रस्सी सर्प नहीं बन सकती, वैसे ही गुणों से परे और विशुद्ध आत्मा कभी भी विश्व नहीं बन सकता, यह निश्चित है। 8-जिस शास्त्र में आत्म-बोध विषयक उपदेश है, उसके अध्ययन से ही निश्चय होता है कि ईश्वर कहे जाने वाले इंद्रादि देवगण भी अनित्य ही हैं, अर्थात उनका भी आवागमन निश्चित है। 9-जैसे कि वायु क्षोभ से समुद्र में फेन और बुद्बुदे उत्पन्न होते और तुरंत ही समुद्र में लीन हो जाते हैं, वैसे ही माया के प्रभाव से आत्मा के द्वारा ही यह क्षणभंगुर संसार उत्पन्न होता और फिर आत्मा में ही लीन हो जाता है। आत्मा का संसार से अथवा किसी भी वस्तु से भेद नहीं है और भेदों की प्रतीति,भ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। भ्रम का नाश होते ही अनेकत्व के बोध का भी नाश हो जाता है। 10-जो उत्पन्न हो चुका है और जो भविष्य में उत्पन्न होगा अर्थात् जो कुछ मूर्तिमान है और जो कुछ अमूर्त है, वह यह संपूर्ण जगत माया के आवरण से आत्मा द्वारा ही प्रकट हुआ है। यह मिथ्या जगत अविद्या की कल्पना से कल्पित हुआ है। इसकी जड़ ही मिथ्यात्व पर आधारित है, तब यह स्वयं ही कैसे सत्य हो सकता है। 11-केवल चैतन्य आत्मा से ही यह संपूर्ण चराचर विश्व उत्पन्न होता है, इसलिए सब कुछ छोड़ कर एक चैतन्य आत्मा का आश्रय लेना ही श्रेयस्कर है। जैसे घट के भीतर और बाहर आकाश प्रवृत्त रहता है, वैसे ही आत्मा भी ब्रह्मांड के भीतर-बाहर पूर्ण रूप से व्याप्त रहती है। 12-जैसे सभी भूतों में आकाश सदा व्याप्त रहता है, वैसे ही आत्मा भी ब्रह्मांड के भीतर-बाहर रहती है। जिस प्रकार सभी भूतों से आकाश समन्वित रहता है, वैसे ही आत्मा भी संपूर्ण अर्थात उत्पन्न वस्तुओं में सदा निहित रहती है। 13-उस आत्मा का प्रकाशक कोई अन्य नहीं है, यह स्वयं ही प्रकाशमान रहती है और स्वयं प्रकाशमान होने के कारण ही वह ज्योति स्वरूप है। देश-काल के प्रमाण से वह अवच्छिन्न नहीं है। इसलिए आत्मा सदा सब प्रकार से परिपूर्ण है। 14-नाशवान पंचभूतों के नाश से इस (आत्मा) का नाश नहीं होता, क्योंकि आत्मा तो सदा अविनाशी है उस का किसी प्रकार से नाश संभव नहीं है। जब अन्य कोई है नहीं तो यह निश्चय है कि वह आत्मा ही सर्वत्र व्याप्त है। जब अन्य सब कुछ मिथ्या है, तो वही शुद्ध आत्मा सत्य हो सकती है। 15-अविद्या से उत्पन्न हुए इस संसार के दुख नष्ट होने पर सुख का उदय होता है,ऐसी मान्यता है। परंतु ज्ञान से दुख का न तो आदि है और न अंत ही है। आत्मा अवश्य ही सुख रूप है, जिसके द्वारा अज्ञान का नाश होता है। तब यह समझ में आता है कि विश्व का कारण ज्ञान ही है। इसलिए आत्मा ही ज्ञान है और ज्ञान सनातन अर्थात् अनादि काल से चला आता है। 16-काल के द्वारा विविध रूप वाला विश्व उत्पन्न होता है, इसलिए वह एक आत्मा ही है। इस प्रकार आत्मा के लिए कल्पना का कोई मार्ग खुला नहीं है अर्थात् आत्मा कल्पित नहीं वरन सत्य है। जो आत्मा से बाहर अर्थात् भिन्न पदार्थ हैं वे सब काल के प्राप्त हो जाने पर नष्ट हो जाते हैं। इसलिए आत्मा द्वैत रहित अर्थात अद्वैत है, उसको वाणी से नहीं अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। 17-वह आकाश नहीं है, इसलिए उसमें शब्द का अभाव है। वह वायु नहीं है, इसलिए स्पर्श से परे हैं। वह अग्नि नहीं है, इसलिए रूप रहित है। वह जल नहीं है, इसलिए रसहीन है। वह पृथ्वी नहीं है, अतः उसमें गंध भी नहीं है। वह कार्य नहीं है, क्योंकि कारण से रहित है और न वह ब्रह्मादि ईश्वर ही है। वह तो पूर्णकाम है अर्थात उसे किसी प्रकार की कामना नहीं है। इस प्रकार आत्मा से, आत्मा को,आत्मा में ही देखने वाला योगी सभी संकल्पों को और मिथ्या भवजाल को त्याग कर संन्यास परायण रहता है। 18-वह योगी आत्मा से, आत्मा को,आत्मा में ही देखता हुआ सुखात्मक होकर संसार को भूल जाता है और आनंदरूपिणी समाधि में तीव्रता से रम जाता है। माया क्या है? 16 FACTS;- 1-माया ही विश्व की जननी है, क्योंकि उसी से विश्व उत्पन्न होता है, किसी अन्य के द्वारा नहीं होता। इसलिए आत्मज्ञान के द्वारा इस माया के नष्ट हो जाने पर निश्चय ही इस विश्व प्रपंच का नाश हो जाता है। यह संपूर्ण विश्व-प्रपंच माया की ही विलास है। इसलिए, इस शरीर को सुखात्मक मानकर इससे प्रीति करना ठीक नहीं है। 2-इस जगत में शत्रु, मित्र और उदासीन के रूप में तीन प्रकार का व्यवहार दिखाई देता है। प्रिय और अप्रिय के आधार पर होने वाले भेद से ही यह संपूर्ण जगत बंधा हुआ है। 3-पुत्र आदि कुटंबियों का सब नाता भी आत्मा की उपाधि से ही है। यह विश्व माया से ही विलसित है,ऐसा श्रुति के प्रमाण से जानकार ही योगीजन आत्मा में लीन रहते हैं। इस विश्व की उत्पत्ति-स्थिति कर्म से है अर्थात दुखादि कर्म से ही होते हैं, कर्म के न रहने पर कोई दुख नहीं रहता। जब आत्मा माया की उपाधि को जीत लेती है, तब माया रहित होने पर अखंड ज्ञानरूप विशुद्ध, ब्रह्मा की प्रतीति होती है। 5-आत्मा स्वेच्छापूर्वक स्वयं ही प्रजाओं का सृजन करती है और इच्छा अविद्या से उत्पन्न होती है, जो कि स्वभाव से मिथ्या है, इसलिए मिथ्या माया से उत्पन्न हुई सृष्टि भी मिथ्या ही है। शुद्ध ब्रह्म से विद्या का संबंध स्वाभाविक है और उस ब्रह्म के ही तेजरूप अंश से आकाश का प्राकट्य हुआ है। 6-उस आकाश से वायु और अग्नि प्रकट हुई। अग्नि से जल और जल से पृथ्वी प्रकट हुई। इस भांति आकाश से वायु और आकाश-वायु के योग से अग्नि उत्पन्न हुई। 7-आकाश,वायु और अग्नि के योग से जल की उत्पत्ति हुई तथा आकाश ‘वायु’ अग्नि और जल के संयोग से पृथ्वी उत्पन्न हुई। 8-आकाश का गुण शब्द है। वायु के दो गुण हैं, चंचलता और स्पर्श। तेज अर्थात अग्नि का गुण है। जल का गुण रस होता है। पृथ्वी का लक्षण गंध है। इस प्रकार आकाश में एक गुण, वायु में दो गुण, अग्नि में तीन और जल में चार होते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध इन पांचों गुणों की विद्यमानता पृथ्वी में कल्पित की गई है। 9-नेत्रों के द्वारा रूप को ग्रहण किया जाता है और नासिका के द्वारा गंध का तथा जिह्वा के द्वारा रस ग्रहण किया जाता है। त्वचा से स्पर्श का और कानों से शब्द ग्रहण होते हैं। यह निश्चित नियम हैं जिनको किसी भी प्रकार से टाला नहीं जा सकता । । 10-यह संपूर्ण चराचर संसार एक ही चैतन्य से उत्पन्न हुआ है, इस प्रकार कल्पना से ही संसार सत्य प्रतीत होता है। परंतु संसार का अभाव होने पर उस एक विशुद्ध चैतन्य आत्मा के अतिरिक्त कुछ और शेष नहीं रहता। पृथिवी जल में लीन हो जाती है और जल अग्नि में लीन हो जाता है। वैसे ही अग्नि का वायु में ओर वायु का आकाश में लीन होना निश्चित है। 11-तत्पश्चात आकाश अविद्या में लीन हो जाता है और अविद्या स्वरूपिणी माया परमपद में जाकर लयभाव को प्राप्त हो जाती है। अर्थात प्रत्येक भूत अपने अपने कारण में लीन हो जाता है और तब एक मात्र ब्रह्मरूप परमपद ही शेष रहता है। 12-परमात्मा की यह दो शक्तियां विक्षेप और आवरण स्वरूप हैं। ये अत्यंत दुख देने वाली हैं, जिनका कि अंत ही नहीं हो पाता। वह महामाया त्रिगुणात्मिका अर्थात सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से युक्त हैं। यह वन गुणों का इच्छित रूप धारण करती रहती है यही मायामायी आवरण शक्ति जब ज्ञान का आवरण ओढ़ लेती है तब स्वयं ही विज्ञानरूपिणी बन जाती है। फिर यही विक्षेप स्वभाव वाली शक्ति जगत् के आकार को प्रदर्शित करती हैं। 13-यही महाविद्या तमोगुण से युक्त होती है, तब दुर्गास्वरूप धारण कर लेती है और यही चैतन्य रूवरूप ईश्वर को आविर्भूत करती है, यह निःसंदेह सत्य है, जब यह सत्त्वगुण की अधिकता को धारण कर लेती है, तब दिव्य स्वरूप धारण करके विष्णुरूप चैतन्य को उत्पन्न करती है और जब यह विद्या रजोगुण के बाहुल्य से युक्त होती है, तब सरस्वती स्वरूपिणी होकर ब्रह्मारूप चैतन्य को उत्पन्न करती है। 14-तात्पर्य यह है कि तमोगुण की अधिकता से यही शक्ति दुर्गारूपिणी होकर संहारकर्त्ता शिव को प्रकट करती है, सत्त्वगुण का अधिकता से विश्व-पालक विष्णु को प्रकट करती है तथा रजोगुण की अधिकता से सरस्वती रूप होकर सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा को उत्पन्न करती है। इस प्रकार यह शक्ति ही संसार को उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में कारण हैं। अलग-अगल गुणों के धारण करने से इसके स्वरूप में विभिन्नता दिखाई पड़ती है। 15-जितने भी देवता हैं, वे सब एक ही शक्ति की अभिव्यक्ति हैं। माया के अधीन होने के कारण विभिन्नता दिखायी पड़ती है। इसीलिए, विज्ञजनों ने सृष्टि की इस प्रकार कल्पना की है। सब कुछ आत्मा से ही उत्पन्न हुआ है। अतः आत्मा से भिन्न जो कुछ भी है वह सब कल्पना मात्र ही है। 16-प्रमेयत्वादि रूप अर्थात् संसार में जो कुछ भी दिखाई देता है, उन सबको प्रकाशित करने वाली एक आत्मा ही है। यह जो भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देते हैं वह सब उपाधि के ही भेद है, यथार्थ में तो उसमें कुछ भेद नहीं है। एक सत्ता से परिपूर्ण हुई वह आत्मा ही सर्वत्र आनंदरूप से विद्यमान रहती है। उसे भिन्न कहीं कोई नहीं है, जिसने ऐसा ज्ञान प्राप्त करके उसमें चित्त को स्थित कर लिया है वही पुरुष जन्म-मरण रूपी सांसारिक दुःखों से मुक्त हो गया। क्या ज्ञानी समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है ? 10 FACTS;- 1-ज्ञान का प्रादुर्भाव होते ही सभी मिथ्या धारणाओं को उसमें विलोपन हो जाता है। उस सतत् विद्यमान आत्मा में मन को लीन कर लेना चाहिए। आत्मा में सभी उत्पन्न पदार्थों का लय हो जाता है, इसलिए मन को केंद्रित कर आत्मा का ही चिंतन करना चाहिए। 2-अपने पूर्व कर्मों के अनुसार ही जीव माता-पिता के वीर्य-रज से अन्नमय कोष धारण करता है। और पूर्व जन्म के कर्मा के अनुसार कर्मफल भोगता है। मांस, अस्थि स्नायु और मज्जा आदि नाडि़यों के बंधन से बंधा हुआ शरीर भोग-मंदिर रूप होकर दुःख का कारण होता है। अभिप्राय यह है कि यह शरीर ही दुःख स्वरूप है, इसलिए इसमें आत्म भाव रखना व्यर्थ ही है। 3-यह शरीर परमेष्ठी अर्थात ब्रह्मा के द्वारा पंचभूतों से बनाया गया है तथा ब्राह्मांड संज्ञक होकर सुख-दुख भोगने के लिए ही इसकी कल्पना की गई है। शिवरूप बिंदु और शक्तिरूप रज के संयोग से ही यह शक्तिस्वरूपा जड़ माया अपने ऐश्वर्य से ही स्वप्न के समान शरीरों को उत्पन्न करती है। 4-इस शरीर में सप्तद्वीपों के सहित सुमेरु पर्वत विद्यमान है। सरिता, सागर, पर्वत, क्षेत्रपाल, ऋषि-मुनि और सभी नक्षत्र ग्रह, पुण्य, तीर्थक्षेत्र एवं पीठ और पीठासीन देवता सभी की इस शरीर में विद्यमानता है। अभिप्राय यह है कि इस शरीर में ही सब पुण्य स्थान, तपोवन और देवालय आदि स्थित हैं, इसलिए साधक को अपने शरीर में स्थित उन स्थानों को जानकर वहीं पुण्य संचय करना चाहिए। उसे कहीं अन्यत्र भटकने की आवश्यकता नहीं है। 5-सृष्टि और संहार करने वाले चंद्र-सूर्य इस देह में ही भ्रमण करते रहते हैं और आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी, यह पांचों तत्व भी देह में सदा विद्यमान रहते हैं। तीनों लोकों में जितने भी भूत हैं, वे सभी शरीरस्थ सुमेरू के आश्रय में रहते हुए अपने-अपने व्यवहार में प्रवृत्त रहते हैं। इस सबको भले प्रकार से जानने वाला निःसंदेह योगी है। 6-यह शरीर ब्रह्मांड संज्ञक है अर्थात ब्रह्मांड में और इसमें कोई भेद नहीं अथवा जो कुछ इस शरीर में है वहीं ब्रह्मांड में है। जैसे शरीर में सभी देश और सुमेरू आदि पर्वत स्थित हैं, वैसे ही इस शरीर में सुमेर पर्वत विद्यमान है और उसके शृंग के ऊपर अपनी आठ कलाओं के सहित चंद्रमा अवस्थित है। 7-वह चंद्रमा अधोमुख रहकर दिन-रात अमृत की वर्षा करता रहता है। उस अमृत के दो भेद होते हैं-सूक्ष्म और स्थूल। शरीर की तुष्टि के लिए इड़ा नाड़ी के मार्ग से जो पवित्र जल रूपी मंदाकिनी प्रवाहित है वह अवश्य ही शरीर की रक्षा और पोषण करती है। वह अमृत रश्मियों से युक्त इड़ा नाड़ी (नासिका के) वाम भाग में स्थित रहती है। 8-वह शुद्ध दुग्ध के समान आभा वाला चंद्रमा हर्षपूर्वक अपने मंडल में मेरु पर आकर इड़ा के रंध्र मार्ग के द्वारा शरीर को पुष्ट करता है। मेरु (मेरुदंड) के मूल में अर्थात नीचे की ओर अपनी बारह कलाओं से युक्त हुआ सूर्य स्थित रहता है दक्षिण पथ अर्थात पिंगला नाड़ी के मार्गों से प्रजापति ऊर्घ्वगति वाला होता है। 9- चंद्रमा से स्रवते हुए उस अमृत को सूर्य अपनी रश्मियों के सामर्थ्य से अवश्य ही ग्रास कर लेता है और वायुमंडल में मिलकर संपूर्ण शरीर में भ्रमण करता रहता है। यह सूर्य परम निर्वाणमूर्ति दक्षिण पथ की ओर है अर्थात पिंगला नाड़ी के दक्षिण भाग में स्थित है। 10-ये विराट और लघु ब्रह्माण्ड और इनमें स्थित सभी वस्तुएं स्वर से निर्मित हैं और स्वर ही सृष्टि के संहारक साक्षात् महेश्वर (शिव) हैं। स्वर के ज्ञान से बढ़कर कोई गोपनीय ज्ञान, स्वर-ज्ञान से बढ़कर कोई धन और स्वर ज्ञान से बड़ा कोई दूसरा ज्ञान न देखा गया और न ही सुना गया है। .....SHIVOHAM..