वास्तु पुरुष मंडल
- Chida nanda
- Jul 6, 2018
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वास्तु पुरुष मंडल का अर्थ है – भवन में स्थित सर्वव्यापक आत्मा। वास्तु पुरुष का अर्थ है भवन के अंदर का निरंतर परिदृश्य; पुरुष का अर्थ है जो स्थाई है, सदा से है। किसी को उसके पैदा होने का रहस्य नहीं पता, पर फिर भी वह है। एक स्पेस जो भवन बनाते ही विकसित हो गया – भवन के भीतर का आकाश या भवन की आत्मा भी उसे कहा जाता है। यही वास्तु पुरुष है।
वास्तु पुरुष की कहानी
वास्तु शास्त्र में वास्तु पुरुष की एक कथा है। देवताओं और असुरों का युद्ध हो रहा था। इस युद्ध में असुरों की ओर से अंधकासुर और देवताओं की ओर से भगवान शिव युद्ध कर रहे थे। युद्ध में दोनों के पसीने की कुछ बूंदें जब भूमि पर गिरी तो एक अत्यंत बलशाली और विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई। उस विराट पुरुष से देवता और असुर दोनों ही भयभीत हो गए। देवताओं को लगा कि यह असुरों की ओर से कोई पुरुष है। जबकि असुरों को लगा कि यह देवताओं की तरफ से कोई नया देवता प्रकट हो गया है। इस विस्मय के कारण युद्ध थम गया और अंत में दोनों उस विराट पुरुष को लेकर ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने उस पुरुष को अपने मानसिक पुत्र की संज्ञा दी और उनसे कहा कि इसका नाम वास्तु पुरुष होगा। वास्तु पुरुष वहाँ पर एक विशेष मुद्रा में शयन के लिए लेट गए और उनके कुछ हिस्सों पर देवताओं ने तथा कुछ हिस्सों पर असुरों ने अपना वास कर लिया। ब्रह्मा जी ने यह भी आदेश दिया कि जो कोई भी भवन, नगर, तालाब, मंदिर आदि का निर्माण करते समय वास्तु पुरुष को ध्यान में रख कर काम नहीं करेगा तो असुर लोग उसका भक्षण कर लेंगे। जो व्यक्ति वास्तु पुरुष का ध्यान रख कर कार्य करेगा, देवता उसके कार्य में सहायक होंगे। इस प्रकार वास्तु पुरुष की रचना हुई।
क्या है वास्तु पुरुष
देव शब्द का मूल अर्थ है ‘स्वयं में प्रकाशमान’। कोई भी ऐसी शक्ति जो किसी कार्य विशेष को करने में सहायक है, उसे देवmahavastu vastu purush कहा जाता है। देव तत्व क्या है? आप अपना या दूसरों का जीवन सुखी बनाने के लिए कुछ करने की मन से चाहत रखने लगे। यही रचनात्मक ऊर्जा है देव तत्त्व। परन्तु तभी अचानक एक द्वंद्व (कॉनफ्लिक्ट) आया कि यह कैसे हो सकता है? यह तो ऐसा हो ही नहीं सकता। अगर ऐसा हो गया तो हमें नुकसान हो जाएगा, आदि। यही डर और अज्ञान असुर तत्त्व है।
भगवान शिव और अंधकासुर का युद्ध महज प्रतीकात्मक है। वे पसीने की बूंदें इस युद्ध का संपूर्ण प्रयास (टोटल एफर्ट) हैं। उससे जिस व्यवस्था का निर्माण हुआ, वह वास्तु पुरुष है। ब्रह्मा जी ने स्पेस के एक हिस्से को, जहाँ संपूर्ण व्यवस्था का निर्माण हुआ, उस व्यवस्थित आकाश को अपने मानस पुत्र की संज्ञा दी। भवन का निर्माण होते ही संपूर्ण जगत को रचने वाली शक्तियाँ उस भवन में आ जातीं हैं। उसका अपना एक स्वरूप है, जिसे हम वास्तु पुरुष का नाम देते हैं।
वास्तु पुरुष का प्रभाव
यहां पर ब्रह्मांडीय मन (ब्रह्मा जी) ने आगे कहा कि जो व्यक्ति घर, तालाब, जलाशय, मंदिर, नगर व्यवस्था में इसका ध्यान नहीं करेगा, उसका असुर भक्षण करेगा। ध्यान का अर्थ है यदि उस व्यवस्था को समझते हुए आप कार्य नहीं करेंगे तो असुरों का भोजन बनेंगे। असुरों का भोजन होने का अर्थ है कि वहां पर जो नकारात्मक शक्तियां हैं, वे आपके भीतर भी क्रियाशील हो जाएंगी। वहां पर डर लगेगा, द्वंद्व आएगा, दुविधा आएगी और कार्य को करने के मार्ग में जो भी नकारात्मक प्रभाव है, वह जागृत हो जाएगा।
मंडलों का निर्माण, यंत्रों का निर्माण, जितने भी हिंदू रीति-रिवाज हैं, कर्मकाण्ड हैं, वेदियों का निर्माण है, यज्ञ का निर्माण है, उन सभी का एक ही आधार है – और वह है ‘वास्तु पुरुष मंडल’। इस प्रकार अदृश्य अथवा प्रकट इंद्रियों के माध्यम से बाहरी प्रेरणाओं को समेट कर हमारे अप्रकट अथवा अंत:चेतन तक पहुंचाया जाता है। यही वास्तु शास्त्र का मूल सिद्धांत है।
वास्तु शब्द ‘वस निवासे धातु से निष्पन्न होता है, जिसे निवास के अर्थ में ग्रहण किया जाता है। जिस भूमि पर मनुष्यादि प्राणी वास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। इसके गृह, देवप्रासाद, ग्राम, नगर, पुर, दुर्ग आदि अनेक भेद हैं। वास्तु की शुभाशुभ-परीक्षा आवश्यक है। शुभ वास्तु में रहने से वहां के निवासियों को सुख-सौभाग्य एवं समृद्धि आदि की अभिवृद्धि होती है और अशुभ वास्तु में निवास करने से इसके विपरीत फल होता है।
वास्तु चक्र अनेक प्रकार के होते हैं। इसमें प्रायः 49 से लेकर एक सहस्त्र तक पद (कोष्ठक) होते हैं। भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न पद के वास्तु चक्र का विधान है। उदाहरण स्वरूप ग्राम तथा प्रासाद एवं राजभवन आदि के अथवा नगर-निर्माण करने में 64 पद के वास्तु चक्र का विधान है। समस्त गृह-निर्माण में 81 पद का, जीर्णोद्धार में 49 पद का, प्रासाद में तथा संपूर्ण मंडप में 100 पद का, कूप, वापी, तडाग और उद्यान, वन आदि के निर्माण में 196 पद का वास्तु चक्र बनाया जाता है। सिद्धलिंगों की प्रतिष्ठा, विशेष पूजा-प्रतिष्ठा, महोत्सवों, कोटि होम-शांति, मरुभूमि में ग्राम, नगर राष्ट्र आदि के निर्माण में सहस्त्रपद (कोष्ठक) के वास्तु चक्र की निर्माण और पूजा की आवश्यकता होती है। जिस स्थान पर गृह, प्रासाद, यज्ञमंडप या ग्राम, नगर आदि की स्थापना करनी हो उसके नैऋत्यकोण में वास्तु देव का निर्माण करना चाहिये। सामान्य विष्णु-रुद्रादि यज्ञों में भी यज्ञ मंडप में यथास्थान नवग्रह, सर्वतोभद्र मंडलों की स्थापना के साथ-साथ नैऋर्त्यकोण में वास्तु पीठ की स्थापना आवश्यक होती है और प्रतिदिन मंडलस्थ देवताओं की पूजा-उपासना तथा यथा-समय उन्हें आहुतियाँ भी प्रदान की जाती हैं। किंतु वास्तु-शांति आदि के लिए अनुष्ठीयमान वास्तुयोग-कर्म में तो वास्तुपीठ की ही सर्वाधिक प्रधानता होती है। वास्तु पुरुष की प्रतिमा भी स्थापित कर पूजन किया जाता है। वास्तु देवता का मूल मंत्र इस प्रकार है-
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवो भवानः।
यत्त्वेमहे प्रतितन्नोजुष- स्वशं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।।
(ऋग्वेद 7।54।1)
इसका भाव इस प्रकार है- हे
वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं, इस पर आप पूर्ण विश्वास करें और तदनन्तर हमारी स्तुति- प्रार्थनाओं को सुनकर आप हम सभी उपासकों को आधि-व्याधि से मुक्त कर दें और जो हम अपने निवास
क्षेत्र में धन-ऐश्वर्य की कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तु क्षेत्र या गृह में निवास करने वाले हमारे स्त्री-पुत्रादि परिवार-परिजनों के लिए कल्याणकारक हों तथा हमारे अधीनस्थ वाहन तथा समस्त कर्मचारियों का भी कल्याण करें। वैदिक संहिताओं के अनुसार वास्तोष्पति साक्षात् परमात्मा का ही नामान्तर है क्योंकि वे विश्व ब्रह्माण्ड रूपी वास्तु के स्वामी हैं।
वैदिक वास्तु के वास्तु पुरुष मंडल में 45 देवता का वास बताया गया है. ऐसा माना जाता है के हमारे जीवन की सभी समस्याऍ इन्ही 45 देवता के अंतर्गत आती है. ये 45 देवता एक तरह से 45 ऊर्जा क्षेत्र है जो हमारे जीवन को प्रभावित करते है. आज इस series को start करते है और ईशान कोण के देवता जब भी कोई घर का निर्माण होता है तो प्लाट में ऊर्जाओं का निर्माण स्वयं ही होने लगता है. इसमें सबसे पहले जिस ऊर्जा का निर्माण होता है वो ऊर्जा कोनों में produce होती है जैसे ईशान कोण, आग्नेय, वायव्य, नैऋत्य कोण में.
वास्तुपुरुष के बारे में परिकल्पना है कि वह उत्तर -पूर्व, ईशान कोण NE में अपना सिर औंधा किए हुए हैं । इसका सिर व दोनों भुजाएं उत्तर-पश्चिम NW एवं दक्षिण-पूर्व SE में स्थित है। पैर दक्षिण-पश्चिम के मध्य नैऋत्य कोण SW में है।
किसी भी भूखण्ड पर चारदीवारी बन जाती है तब वह एक वास्तु कहलाता है। किसी भी भू-खण्ड के छोटे-से टुकड़े को यदि चारदीवारी बनाकर अलग किया जाता है तो उसमें वह सभी तत्व व ऊर्जा पाई जाती है जो एक बड़े भू-खण्ड में होती है अर्थात् एक चारदीवारी के भीतर स्थित छोट से छोटा भू-खण्ड भी सम्पूर्ण पृथ्वी का एक छोटा-सा रूप ही है। वास्तुपुरुष उस भूखण्ड पर निर्मित भवन का अधिष्ठाता होता है, जिसका
मुंह उत्तर-पूर्व के मध्य ईशान कोण में स्थित रहता है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे यही दिशाएं सूर्य की प्रातःकालीन जीवनदायी ऊर्जा पाने का स्रोत होती है जिसे वह अपने आंख, नाक, मुंह के माध्यम से प्राप्त करता है।
इसीलिए उत्तर-पूर्व का भाग अर्थात ईशान कोण को अधिक खुला रखा जाता है ताकि इसके शुभ परिणाम मिल सके। वायव्य कोण में वास्तु पुरुष का बांया हाथ होता है। बांया हाथ के पास ही हृदय होता है। इस वायव्य कोण से हृदय को क्रियाशील रखने के लिए आक्सीजन मिलती रहती है। आग्नेय कोण तरफ वास्तु पुरुष का दांया हाथ होता है, जहां से वह ऊर्जा प्राप्त करता है और दक्षिण नैऋत्य कोण में इसके पैर होते हैं, उसे बंद रखा जाता है ताकि विभिन्न कोणों से मिलने वाली ऊर्जा संग्रहित हो सके।
आज सबसे पहले बात करते है ईशान कोण में बनने वाली चार ऊर्जा जगहों की. इन्ही ऊर्जा क्षेत्रों से आप अपने जीवन की समस्याओं को पहचान सकते है.
N7-अदिति (aditi zone vastu) - इसमें सबसे पहले जिस ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है वह अदिति के नाम से जाना जाता है. ये ऊर्जा क्षेत्र हमें बांधे रखती है, एक हौसला मिलता रहता है. संयम प्रदान करने वाला ये पीले रंग का जोन जब असंतुलित होता है तो मन में एक अजीब सा डर रहता है. अगर व्यक्ति में अंदर बिना बात के घबराहट बनी रहती है तो यही जोन खराब होता है. इस जोन में अगर मंदिर होता है तो व्यक्ति को परेशानी के समय में एक शक्ति मिलती रहती है जो परेशानी से लड़ने में मदद देती है.
N8-दिति (diti vastu zone) - अदिति के बाद उत्तर-पूर्व में उत्तर की तरफ ही एक दूसरे ऊर्जा का निर्माण होता है जिसे दिति के नाम से जाना जाता है. ये शक्ति हमे सोच देती है एक विशाल और व्यापक सोच और उसकी तरफ पहुंचने का रास्ता क्या होना चाहिए। ये जोन खराब होने पर लोग निर्णय ही नहीं ले पाते उन्हें पता ही नहीं के उन्हें क्या करना है. बस अपनी पुराणी परम्परा को घसीटते है. खुद की कोई निर्णय क्षमता नहीं होती.
E1-शिखी - shikhi vastu zone - उत्तर पूर्व दिशा में पूर्व की तरफ के पहले जोन को शिखि कहा गया है. शिखि एक सोच है एक idea, एक ऐसा idea जो सबको प्रभावित करे. जब हमें किसी आईडिया की जरूरत हो जो की बहुत बड़ा हो तो इस जोन का balance होना जरूरी है. किसी भी काम की शुरुआत एक तरह से शिखि से ही होती है. एक ऐसा idea जो बहुत बड़ा होता है या बड़ा बन जाता है शिखि की शक्ति के कारण ही होता है.
E2-पर्जन्य - prajanya vastu zone - शिखि के बराबर में पूर्व की तरफ पर्जन्य वास्तु की जगह बतायें गयी है. एक तरह से ये चारों जोन - अदिति, दिति , शिखि पर्जन्य एक दूसरे से जुड़े है. पर्जन्य जोन में एक तरह से हमारी जिज्ञासा शांत होती है. वेदो के अनुसार ये घर में संतान उत्पत्ति का करक भी होता है, इस जोन को वृद्धि का जोन भी कहा गया है.
शायद यही कारण मिलता है के क्यों इस zone को सबसे खाली और साफ़ सुथरा रखने के लिए कहा जाता है क्यूंकि एक शुरुआत करने के लिए base हमें यही से मिलता है.
पश्चिम दिशा 225 से 315 degree मानी जाती है इसे 225 डिग्री से शुरू करते है तो 315 तक 8 parts में बाँट दे लगभग 11.25 डिग्री की एक पार्ट बनेगा
w1 - पितृ - बेहद नुकसान दायक, धन और संबंध बहुत खराब होंगे।
w2- दौवारीक-अस्थिरता देता है. टिकाव नहीं रहेगा
w3- सुग्रीव - ये entrance विकास देती है आगे बढ़ते ही रहेंगे
w4- पुष्पदन्त (pushpdant vastu) - एक संतुष्ट जिंदगी देता है ख़ुशी मिलती है
w5- वरुण (varun) - व्यक्ति बहुत ज्यादा पाने की चाहत रखने लगता है जिससे नुकसान संभव है
w6- असुर (asur) - ये नुकसान देती है एक मानसिक परेशानी चलती रहती है
w7- शोष - shosh in vastu - गलत आदत पड़ जाती है. व्यक्ति बुरी लत में उलझा रहता है
w8- पापयक्षमा - इसमें व्यक्ति मतलबी हो जाता है अपना ही फायदा देखने वाला।
Effects of Entrances of East Facing Properties
E1-शिखि (shikhi) - अग्नि संबंधित दुर्घटनाएं इन घरों में देखि जाती है.
E2-पर्जन्य (prajnya) - खर्चे बहुत ज्यादा होते है, इसके अलावा लड़कियों की संख्या अधिक हो सकती है
E3-जयंत (jayant)- कमाई अच्छी होती है. ये द्वार शुभ होता है
E4-इंद्र (indra)- ऐसे लोग GOVERNMENT के अच्छे सम्पर्क में रहते है शुभ द्वार
E5-सूर्य (surya)- ऐसे लोगो में attitude problem होती है, जिसके कारण बार बार नुकसान हो सकता है
E6-सत्य (satya)- ऐसे लोग भरोसेमंद नहीं माने जाते, अपनी बात पर भी नहीं टिकते।
E7-भृश(bhrish)- स्वभाव थोड़ा कटु होता है, परेशान ही रहते है हर वक़्त
E8-अंतरिक्ष (antriksh)- नुकसान, एक्सीडेंट्स. चोरी ऐसे घरों में चलती रहती है
East Facing घरों में द्वार की सही दिशा जानने के बाद घर की दशा भी बताई जा सकती है, इन Entrances के Negative Effects को सही Remedies से काफी हद कम किया जा सकता है