क्या तीर्थों की व्यवस्थाएं सिंबालिक ऐक्ट है?क्या समूह प्रयोग/मॉस एक्सपेरीमेंट तीर्थ का महत्वप
- Jun 5, 2019
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क्या तीर्थों की व्यवस्थाएं सिंबालिक ऐक्ट है?-
19 FACTS;-
1- गुप्त तीर्थों के द्वार है, उन तक पहुंचने की व्यवस्थाएं है। लेकिन उस सबके आंतरिक सूत्र है। इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके। जैसे कि पिरामिड के सारे कमरे, उनका आयतन एक हिसाब में है।कभी आपने ख्याल किया है,कि कहीं छत बहुत नीचा हो, यद्यपि हम से अभी दो फिट ऊँचा है, आपके सिर को नहीं छू रहा हो, हमको दबाएगा नहीं लेकिन हमें भास होगा कि हमारे भीतर कोई चीज दबने लगी है।
क्योंकि जब आप नीचे छत में प्रवेश करते है, तो आपके भीतर कोई चीज सिकुड़ती है।और आप जब बड़े छत के नीचे प्रवेश करते है तो आपके भीतर कोई चीज फैलती है।
2-इस प्रकार कमरे का आयतन इस ढंग से , ठीक उतना ही निर्मित किया जा सकता है जितने में आपको ध्यान आसान हो जाए। ध्यान का उतना आयतन खोज लिया गया था।आपकी अंतर यात्रा के लिए उस आयतन का उपयोग किया जा सकता है। उस कमरे के भीतर रंग, गंध, उस कमरे के भीतर ध्वनि...इस सबका इंतजाम किया जा सकता है; जो आपके ध्यान के लिए सहयोगी हो जाए।उदाहरण के लिए उज्जैन में भर्तृहरि की एक गुफा।पत्नी के धोखे से भर्तृहरि के मन में वैराग्य जागा और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में 12 वर्षों तक तपस्या करते रहे।
3- भर्तृहरि गुफा जमीन के अंदर 20 फुट नीचे है। जिसकी ऊंचाई ज्यादा नहीं है।।गुफा के अन्दर की ऊंचाई काफी कम है जिसके चलते हर कोई व्यक्ति उस गुफा के अन्दर नही जा सकता है और घुटन की वहज से सास लेने में भी परेशानी आती है |गुफा के पास में से शिप्रा नदी बहती है |उसी प्रकार।मथुरा में ध्रुव की तपस्या स्थली है। वह भी जमीन के अंदर है। और उसकी लंबाई का पता नहीं है। परंतु ऊंचाई 6 फीट से ज्यादा नहीं है।
3-सब तीर्थों का अपना संगीत था। सच तो यह है कि सब संगीत, तीर्थों में पैदा हुए और सब संगीत साधकों ने पैदा किए। एक दफा जब यह बात पता चल गई कि संगीत के माध्यम से कोई व्यक्ति परमात्मा की तरफ जा सकता है तो संगीत के माघ्यम से परमात्मा के विपरीत भी जा सकता है, यह भी ख्याल में आ गया। और तब बाद में दूसरे संगीत खोजें गए।गंधें भी खोज ली गई। किसी गंध से परमात्मा की तरफ जाया जा सकता है तो किसी विपरीत गंध से कामुकता की तरफ जाया जा सकता है। किसी विशेष आयतन में ध्यानस्थ हो सकता है तो किसी विशेष आयतन में ध्यान से रोका जा सकता है। वह भी खोज लिया गया।
4-उदाहरण के लिए चीन में ब्रेन वाश के लिए जहां कैदियों को खड़ा करते है, उस कोठरी का एक विशेष आयतन है। उस विशेष आयतन में ही खड़ा करते है। एक निश्चित आयतन , हजारों प्रयोग करके तय हो गया कि इतनी ऊंची, इतनी चौड़ी इतनी आयतन की कोठरी में कैदियों को खड़ा कर दो तो कितनी देर में में वह अपने दिमाग को खो देगा।फिर उसमें एक विशेष ध्वनि भी पैदा करो तो और जल्दी ब्रेनवाश होगा। खास जगह उसके मस्तिष्क पर हैमरिंग करो तो और जल्दी खो देगा।
5-वे कुछ नहीं करते, एक मटका ऊपर रख देते है और एक-एक बूंद पानी उसके सिर पर टपकता रहता है। उसकी अपनी लय है रिदिम है.....बस, टप-टप वह पानी सिर पर टपकता रहता है। चौबीस घंटे वह आदमी खड़ा रहता है , बैठ भी नहीं सकता, हिल भी नहीं सकता और कोठरी का आयतन इतना है कि लेट भी नहीं सकता। वह खड़ा है। मस्तिष्क में पानी टप-टप गिरता जा रहा है। आधा घंटा पूरे होते-होते , सिवाय टिप-टिप की आवाज के कुछ नहीं बचता। आवाज इतनी जोर से मालूम होने लगेगी जैसे पहाड़ गिर रहा है।उस आयतन में अकेली आवाज रह जाएगी और चौबीस घंटे में वह आपके दिमाग को अस्त–व्यस्त कर देगी। चौबीस घंटे के बाद जब आपको बाहर निकालेंगे तो आप वहीं आदमी नहीं होगें। उन्होंने आपको सब तरह से तोड़ दिया है।
6-ये सारे के सारे प्रयोग पहली दफा तीर्थों में खोजें गए, मंदिरों में खोजें गए। जहां से आदमी को सहायता पहुँचाई जा सके। मंदिर के घंटे है, मंदिर की ध्वनियां है, धूप है, गंध है, फूल है, सब नियोजित था। और एक कंटीन्युटी/सातत्य रखने की कोशिश की गई।बीच में कहीं कोई व्यवधान न पड़े इसलिये उसकी अहर्निश धारा जारी रखी जाती रही। जैसे सुबह इतने वक्त आरती होगी, इतनी देर चलेगी। इस मंत्र के साथ होगी। दोपहर आरती होगी। इतनी देर चलेगी। इस मंत्र के साथ होगी। सांझ आरती होगी: इतनी देर चलेगी,ध्वनियों का यह क्रम उस कोठरी में गूंजता रहेगा। पहला क्रम टूटे ,उसके पहले दूसरा रिप्लेस हो जाए। यह हजारों साल तक चलेगा।
7-जिस प्रकार पानी को अगर भाप बनाकर लाख दफा पुन: पुन: पानी बनाया जाए , तो जैसे अल्केमी के हिसाब से उसकी क्वालिटी बदलती है; उसी प्रकार एक ध्वनि को एक कमरे में;लाखों दफा पैदा किया जाए तो उस कमरे की पूरी तरंग, पूरी गुणवत्ता/क्वालिटी बदल जाती है।उसके आसपास व्यक्ति को खड़ा कर देना ;उसके रूपांतरित होने के लिए सहयोगी
हो जाता है।इस प्रकार तीर्थ ,मंदिर का सारा का सारा विज्ञान है। और उस पूरे विज्ञान की अपनी सूत्रबद्ध प्रक्रिया है। एक कदम उठाने से दूसरा कदम उठना है, दूसरा उठाने से तीसरा उठता है। पीछे चौथा उठता है और परिणाम होता है। यदि एक भी कदम बीच में खो गया तो, एक भी सूत्र बीच में खो गया तो परिणाम नहीं होता।
8-एक और बात इस संबंध में ख्याल में ले लेनी चाहिए कि जब भी कोई सभ्यता /कोई विज्ञान बहुत विकसित हो जाता है तो ‘’रिचुअल’’ सिम्पलीफाइड़ हो जाता है। काम्प्लैक्स नहीं रह जाता। जब वह काम विकसित होता है तब उसकी प्रक्रिया बहुत जटिल होती है।पर जब पूरी बात पता चल जाती है।तो उसके क्रियान्वित करने की जो व्यवस्था है वह बिलकुल
सिम्पलीफाइड और सरल जो जाती है।बहुत सी बातें है तीर्थ के साथ,जो समझ में नहीं आ सकेंगी पर घटित होती है। जिनको बुद्धि साफ-साफ नहीं देख पाएगी ,जिनका गणित नहीं बनाया जा सकेगा;लेकिन घटित होती है।
9-अगर एक जंगली आदिवासी देखे कि जब भी प्रकाश करना होता है तो आप अपनी कुर्सी से उठते है, दस कदम चलकर बायी दीवार के पास पहुंचते है,वहां एक बटन को दबाते है और बिजली जल जाती है। वह आदीवासी किसी भी तरह न सोच पाएगा कि इस बटन में और इस दीवार के भीतर इस बिजली के बल्ब से कोई तार जुड़ा है। उसे यह सब एक क्रियाकांड /
रिचुअल मालूम पड़ेगा।उस आदिवासी को तो बिजली के पूरे फैलाव का कोई अंदाजा नहीं हो
सकता। करीब-करीब धर्म के संबंध में भी ऐसा ही है। जिनको भी हम धर्म के क्रिया-काँड कहते है, वह सब हमारे द्वारा पकड़ लिए गए ऊपरी कृत्य है।
10-हमें भीतरी व्यवस्था का कोई भी पता नहीं है।जिस चीज को आप नहीं जानते उसको ऊपर से देखने पर वह रिचुअल मालूम पड़ेगी।ऐसा साधारण आदमियों के साथ ही होता हो ऐसा नहीं, जिनको हम बहुत बुद्धिमान कहते है उनके साथ भी यहीं होगा। क्योंकि बड़े से बड़ा बुद्धिमान भी एक अर्थ में जुवेनाइल है,बचकाना ही होता है। क्योंकि बुद्धि बहुत गहरे ले जाने वाली नहीं है।जब पहली दफा ग्रामोफोन बना,और फ्रांस के साइंस एकेडमी में जिस
वैज्ञानिक ने ग्रामोफोन बनाया वह लेकर गया;तो तीन सौ साल पहले बड़ी ऐतिहासिक घटना घटी ।
11-फ्रैंच एकेडमी के कोई सौ वैज्ञानिक घटना देखने आए थे। उस आदमी ने ग्रामोफोन का रिकार्ड चालू किया, तो जो फ्रैंच एकेडमी का प्रैजिडेंट था, वह थोड़ी देर तो देखता रहा फिर उचक कर उसने उस आदमी की गर्दन पकड़ ली, जो ग्रामोफोन लाया था। क्योंकि उसने समझा कि यह कोई गले की ट्रिक कर रहा है , यह हो कैसे सकता है।यह ऐतिहासिक
घटना बन गई। क्योंकि एक वैज्ञानिक से ऐसी आशा नहीं हो सकती थी कि वह जाकर
उसकी गर्दन पकड़ ले। वह आदमी तो घबराया,उसने कहा कि आप यह क्या करते है। उसने कहा देखो तुम मुझको धोखा न दे पाओगें। वह उसका गला दबाए रहा। लेकिन तब भी उसने देखा की आवाज आ रही है। तब तो वह बहुत घबराया ।
12-उस आदमी को बाहर जाने के लिए कहा लेकिन तब भी आवाज आ रही थी। वह सौ के सौ वैज्ञानिक सकते में आ गए, उनमें से एक ने खड़े होकर कहां कि यह कोई शैतानी ताकत है। इसे छूना-ऊना मत इसमें कुछ न कुछ डेवल जरूर है। शैतान इसमें हाथ बंटा रहा है। यह हो कैसे सकता है? आज हमें हंसी आती है। क्योंकि अब हो गया...। इसका हमें परिचय है।
जो नहीं होता तो हम भी वैसी परेशानी में पड़ जाते।अगर किसी दिन हमारी यह सभ्यता खो जाए, और किसी आदिवासी के पास एक ग्रामों फोन बच जाए तो उसके गांव के लोग उसको मार डालें। क्योंकि वह एक्सप्लेन तो कर नहीं पाएगा कि ये रेकार्ड कैसे बोल रहा है।यह बड़े आश्चर्य की बात है कि सब सभ्यताएं बिलीफ से जीती है।बाकी सभ्यता की कुंजियां तो दो चार आदमियों के पास ही होती है ;सारे लोग तो काम चला लेते है। बस जो काम चलाने वाले है, जिस दिन कुंजियां खो जाए, उसी दिन मुश्किल में पड़ जाएंगे।
13-इसलिए रूस और अमरीका दोनों के वैज्ञानिक टेलीपैथी के लिए भारी रूप से उत्सुक है। अमरीका ने एक छोटा सा कमीशन बनाया है जो तीन ,चार साल सारी दुनिया में घूमा। उस कमीशन ने जो रिपोर्ट दी वह बहुत घबड़ाने वाली है, लेकिन वह सब रिचुअल मालूम होता
है।उसने लिखा है कि अमरीका में एक छोटा सा कबीला बड़ी हैरानी का काम करता है। हर गांव में एक छोटा सा वृक्ष होता है एक खास जाति का, जिससे मैसेज भेजने का काम लिया जाता है । पति गांव गया हुआ है बाजार में सामान लेने, पत्नी को ख्याल आ गया कि वह फलां सामान तो भूल गई, तो जाकर उस वृक्ष को कह देती है कि देखो वहां फलां सामान जरूर ले आना। वह मैंसेज डिलीवर हो जाता है। वह आदमी सांझ को लौटता है तो वह सामान ले आता है। कमीशन के लोगों ने देखा... वह तो घबरा देने जैसी बात थी।
14-हम मोबाइल देखकर, मोबाइल पर बात करते नहीं घबड़ाते।आदिवासी देखकर घबड़ा जाता है कि यह क्या मामला है, आप किससे बात कर रहे है। हमें पूरी सिस्टम का पता है इसलिए हम नहीं घबड़ाते। वायरलेस से हम बात करते है, तो भी हम नहीं घबड़ाते क्योंकि
हम सिस्टम से परिचित है।पर यह जानकर हैरान होते है कि इस वृक्ष से कैसे संवाद हो रहा है। उस कमीशन के लोगों ने दो-चार दिन सब तरह के प्रयोग करके देख लिए। उन स्त्रियों से पूछा, गांव के लोगों से पूछा। उन्होंने कहां, यह तो हमें पता नहीं लेकिन ऐसा सदा होता है। यह वृक्ष की शाखा को लगाते चले जाते है, यहीं एक सनातन नियम है। इसको हमारे बाप-दादों ने और उनके बाप-दादों ने, सबने इसका उपयोग किया।
15-यह वैज्ञानिक की पकड़ से बाहर की बात है। और जो कर रहा है, उसको भी यह नहीं पता है कि इस वृक्ष की प्राण ऊर्जा का टेलीपैथी के लिए उपयोग किया जा रहा है। और हजारों साल से वृक्ष काम कर रहा है ; यह उस गांव के लोगों को कुछ नहीं पता । वह ‘’कुंजी’’ तो खो गयी है , जिसने आविष्कार किया होगा। उसने किया होगा, पर वह उस वृक्ष से काम ले रहे
है, उस वृक्ष को लगाए चले जा रहे है।अब बुद्ध के बोधि-वृक्ष को बौद्ध नहीं मरने देते। यह इस वृक्ष की बात समझकर आपको ख्याल में आ सकेगा कि उसका कुछ उपयोग है। जिस बोधि-वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान हुआ, उसको मरने नहीं दिया गया। असली सूख गया, तो उसकी शाखा अशोक ने श्री लंका में भेज दी। अभी उसकी शाखा को फिर लाकर पुन: आरोपित कर दिया, लेकिन वही वृक्ष कंटीन्यूटी में रखा गया। इस बोध गया के तीर्थ का उपयोग है, वह सब कुछ इस बोधि-वृक्ष पर निर्भर है।
16-इस वृक्ष के नीचे बैठकर बुद्ध ने ज्ञान पाया। और जब बुद्ध जैसे व्यक्ति के ज्ञान की घटना घटती है तो जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध बैठे थे वह वृक्ष बुद्ध के बुद्धत्व को पा गया हो; तो बहुत हैरानी नहीं है। बुद्ध का बुद्धत्व को प्राप्त होना,अलौकिक हो जाना,असाधारण घटना है।अगर आकाश से बिजली चमकती है और वृक्ष सूख जाता है तो कोई कारण नहीं है कि बुद्ध में चेतना की बिजली चमके और इतना तेज फैले कि वृक्ष किन्हीं नए अर्थों में जीवंत हो जाए। वैसा कोई दूसरा वृक्ष नहीं है।बुद्ध के गुप्त संदेश थे...तभी इस वृक्ष को कभी नष्ट नहीं होने दिया
गया। और बुद्ध ने कहा था,' मेरी पूजा मत करना, इस वृक्ष की पूजा से काम चल जाएगा'। इसलिए पाँच सौ साल तक बुद्ध की मूर्ति नहीं बनाई गयी।
17- पाँच सौ साल बाद तक बुद्ध के जितने मंदिर थे वह बोधिवृक्ष की ही पूजा करते रहे है। जो चित्र है उनमें बुद्ध नहीं है बीच में सिर्फ ऑरा है ,बुद्ध का प्रकाश है। जो बोधि-वृक्ष का उपयोग जानते है वे आज भी इस वृक्ष के द्वार बुद्ध से संबंध स्थापित कर सकते है।तो मूल्यवान
वह बोधिवृक्ष है...बोध गया नहीं । उस बोधि वृक्ष के नीचे बरसों तक बुद्ध रहे। उनके पैर के पूरे निशान रखे गए है। जब वह ध्यान करते-करते थक जाते तो , वह घंटों उस वृक्ष के पास घूमते रहते । बुद्ध किसी के साथ इतने ज्यादा नहीं रहे जितने उस वृक्ष के साथ रहे, उस वृक्ष से ज्यादा बुद्ध के साथ कोई नहीं रहा। और इतनी सरलता से कोई आदमी रह भी नहीं सकता जितनी सरलता से वह वृक्ष रहा। बुद्ध उसके नीचे सोये भी है। उसके नीचे बैठे है, उठे है , इसके आस-पास चले है। बुद्ध ने उससे बातें की होंगी, बुद्ध उससे बोले भी होंगे। उस वृक्ष की पूरी जीवन उर्जा बुद्ध से आविष्ट है।
18-जब अशोक ने अपने बेटे महेंद्र को लंका भेजा तो उसके बेटे ने कहा,मैं क्या भेंट ले जाऊँ? उन्होंने कहा, इस जगत में एक ही भेंट हमारे पास है कि तुम इस बोधि-वृक्ष की एक शाखा ले जाओ। तो उस शाखा को लगाया गया,आरोपित किया गया। दुनियां में कभी किसी सम्राट ने किसी वृक्ष की शाखा किसी को भेट नहीं दी होगी। वह कोई भेट है, लेकिन सारा लंका आंदोलित हुआ उस शाखा की वजह से। और लोग समझते है, महेंद्र ने लंका को बौद्ध
बनाया।अशोक की लड़की संध मित्रा भी साथ में थी ..उन दोनों की उतनी बड़ी हैसियत न थी। लंका का कन्वर्शन इस बोधि-वृक्ष की शाखा के द्वारा किया गया कन्वर्शन है। यक बुद्ध के ही सीक्रेट संदेश थे कि लंका में इस वृक्ष की शाखा पहुंचा दी जाए। ठीक समय की और ठीक व्यक्ति की प्रतीक्षा की जाए। और जब ठीक व्यक्ति आ जाए तो इसको पहुंचा दिया गया। क्योंकि इसी से वापस किसी दिन हिंदुस्तान में फिर इस वृक्ष को लाना पड़ेगा।
19-संध मित्रा और महेद्र दोनों बौद्ध भिक्षु थे, बुद्ध के जीवन में थे। हर किसी के साथ वह शाखा नहीं भेजी जा सकती थी ।जो बुद्ध के पास जिया हो, जिसने जाना हो, और जो इस शाखा को वृक्ष की शाखा मानकर न ले जाए ;जीवंत बुद्ध मानकर ले जाए, उसके ही हाथ में दी जा सकती थी। फिर लौटने की भी प्रतीक्षा करनी जरूरी है। उसे वृक्ष को ठीक लोगों के हाथ ही वापस आना चाहिए।ये सारी की सारी अंतर् कथाएं है,या जिसको कहना चाहिए गुप्त इतिहास है जो इतिहास के पीछे चलता है।असली इतिहास वहीं है, जहां घटनाओं के मूल
स्त्रोत घटित होते है।कभी असली इतिहास पर हमारी दृष्टि जाए तो फिर इन सारी चीजों का राज समझ में आता है।
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4-क्या समूह प्रयोग/ मॉस एक्सपेरीमेंट तीर्थ का महत्वपूर्ण प्रयोजन है ?-
11 FACTS;-
1-आमतौर से यह कहना कि हम अलग-अलग व्यक्ति है—यह बड़ा थोथा भ्रम है।अगर हम बहुत लोग शांत होकर बैठें तो फिर बहुत लोग नहीं रह जाते, एक ही व्यक्तित्व रह जाता है। और हम सब की चेतनाएं एक दूसरे में तरंगित और प्रवाहित होने लगती है।अगर कुंभ में
देखे तो तीर्थ ‘ मॉस एक्सपेरीमेंट’ है। एक वर्ष में एक विशेष दिन, करोड़ों लोग एक तीर्थ पर इकट्ठे हो जाएंगे; एक ही आकांक्षा ,एक ही अभीप्सा से सैकड़ों मील की यात्रा करके आ जाएंगे। वह सब एक विशेष घड़ी में , एक विशेष तारे के साथ, एक विशेष नक्षत्र में एक जगह इकट्ठे हो जाते है। इसमें पहली बात समझ लेने की यह है, कि यह करोड़ों लोग इकट्ठा होकर एक अभीप्सा, एक आकांक्षा, एक प्रार्थना से एक धुन करते हुए आ गए है, यह एक चेतना का ‘पुल’ बन गया है।अब यहां व्यक्ति नहीं है। 2- तो व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ता। वहां निपट भीड़ है, जहां कोई चेहरा नहीं है। चेहरा कहां बचेगा इतनी भीड़ में, फेसलेस एक करोड़ आदमी इकट्ठे है। कौन है ,कौन राजा है, और कौन रंक ,कौन अमीर है, कौन गरीब है, अब जानने का कोई मतलब नहीं रह गया... यानी सब फेसलेस हो गया। अब यहां इन सबकी चेतनाएं एक दूसरे के भीतर प्रवाहित होनी शुरू होंगी। अगर एक करोड़ लोगों की चेतना का ‘पुल बन सके,एक इकट्ठा रूप बन जाए, तो इस चेतना के भीतर परमात्मा का प्रवेश जितना आसान है उतना आसान एक-एक व्यक्ति के भीतर नहीं है। यह बड़ा कांटेक्ट फील्ड है।
3-संत नीत्से ने कहीं लिखा है '' एक सुबह बग़ीचे से गुजरते हुए एक छोटे से कीड़े पर उसका पैर लग जाता है। तो वह कीड़ा जल्दी से सिकुड़कर गोल घुंडी बनाकर बैठ जाता है। नीत्से बड़ा हैरान हुआ। उसने कई दफा यह बात देखी है कि कीड़ों को जरा चोट लग जाए तो वह तत्काल सिकुड़कर क्यों बैठ जाते है। उसने लिखा है कि बहुत सोचकर मुझे खयाल में आया कि वह अपना कान्टेक्ट फील्ड़ कम कर लेते है। बचाव का ज्यादा उपाय हो जाता है। कीड़ा पूरा लंबा है, तो उस पर कहीं पैर पड़ सकता है। क्योंकि ज्यादा जगह वह घेर रहा है। वह जल्दी से छोटी जगह में सिकुड़ गया, अब उस पर पैर पड़ने की संभावना अनुपात में कम हो गयी। वह सुरक्षा कर रहा है अपनी। वह अपनी कान्टेक्ट फील्ड़ को छोटा कर रहा है। और जो कीड़ा जितना जल्दी यह कान्टेक्ट फील्ड़ छोटा कर लेता है वह उतना बचाव कर लेता है।
4-आदमी की चेतना जितना बड़ा कान्टेक्ट फील्ड निर्मित करती है, परमात्मा का अवतरण उतना आसान हो जाता है। क्योंकि वह बड़ी घटना है। एक बड़ी घटना के लिए हम जितना बड़ी जगह बना सके उतनी उपयोगी है। इंडीवीजुअल प्रेयर/ व्यक्तिगत प्रार्थना तो बहुत बाद में पैदा हुई, प्रार्थना का मूल रूप तो समूह गत है। वैयक्तिक प्रार्थना तो तब पैदा हुई जब एक-एक आदमी को भारी अहंकार पकड़ना शुरू हो गया।इसलिए जब इंडीवीजुअल
प्रेयर दुनिया में शुरू हुई तब प्रेयर का फायदा खो गया।
5-असल में प्रेयर इंडीवीजुअल नहीं हो सकती। हम इतनी बड़ी शक्ति का आह्वान कर ही नहीं सकते। तो हम उसके अवतरण के लिए जितना बड़ा क्षेत्र दे सकें उतना ही सुगम होगा। तीर्थ इस रूप में एक बड़े क्षेत्र को निर्मित करते है। फिर खास घड़ी , खास नक्षत्र , खास दिन , खास वर्ष में करते है। वह सब सुनिश्चित विधियां थी। इसका अर्थ यह कि उस नक्षत्र में उस घड़ी में पहले भी कान्टेक्ट हुआ है। और जीवन की सारी व्यवस्था पीरियोडिकल है। इसे भी समझ लेना चाहिए।
6-जीवन की सारी व्यवस्था पीरियोडिकल है जैसे कि वर्षा आती है, एक खास दिन पर आ जाती है। और अगर खास दिन पर नहीं आती है , तो उसका कारण यह है कि हमने छेड़छाड़ की है। अन्यथा दिन बिलकुल तय है, गर्मी आती है खास वक्त, सर्दी आती है खास वक्त, वसंत आता है खास वक्त ...सब बंधा है। शरीर भी बिलकुल वैसा ही काम करता है।स्त्रियों का
मासिक धर्म है, ठीक चाँद के साथ चलता रहता है। ठीक अट्ठाईस दिन में उसे लौट आना चाहिए, अगर शरीर बिलकुल ठीक ...स्वस्थ है ।वह चाँद के साथ यात्रा करता है। वह अट्ठाईस दिन में नहीं लौटता तो व्यक्तित्व का क्रम टूट गया है , भीतर कहीं कोई गड़बड़ हो गयी है।
7-सारी घटनाएं एक क्रम में आवर्तित होती है। अगर किसी एक घड़ी में परमात्मा का अवतरण हो गया, तो उस घड़ी को हम अगले वर्ष के लिए फिर नोट कर सकते है।अब संभावना उस घड़ी की बढ़ गयी , वह घड़ी ज्यादा पोटेंशियल हो गयी,उस घड़ी में परमात्मा की धारा पुनः प्रवाहित हो सकती है। इसलिए पुन: पुन: उस घड़ी में तीर्थ पर लोग इकट्ठे होते रहेगे.. सैकड़ों वर्षो तक। अगर वह कई बार हो चुका तो यह घड़ी सुनिश्चित होती जाएगी .. बिलकुल तय हो
जाएगी।जैसे कि कुंभ के मेले पर गंगा में कौन पहले उतरे, वह भारी दंगे का कारण होता है। क्योंकि इतने लोग इकट्ठे नहीं उतर सकते एक घड़ी में ,और वह घड़ी तो बहुत सुनिश्चित है ..बहुत बारीक है। उसमें कौन उतरे, उस पहली घड़ी में जिन्होनें यह घड़ी खोजी है या जिनकी परंपरा और जिनकी धारा में उस घड़ी का पहले अवतरण हुआ है, वह उसके मालिक है। वह उस घड़ी में पहले उतर जाएंगे।और कभी-कभी क्षण का फर्क हो जाता है।
8-परमात्मा का अवतरण करीब बिजली की कौंध जैसा है—कौंधा, और खो गया। उस क्षण में आप खुले रहे तो घटना घट जाएगी। उस क्षण में आँख बंद हो गयी, सोये रहे तो घटना खो
जाएगी।मॉस एक्सपेरीमेंट, समूह प्रयोग का अर्थ है अधिकतम विराट पैमाने पर उस अनंत शक्ति को उतारा जा सके। और जब लोग सरल थे तो यह घटना बड़ी आसानी से घटती थी। उन दिनों तीर्थ बड़े सार्थक थे। तीर्थ से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता था;ट्रांसफार्म होकर ही लौटता था। इसलिए...तो आज आदमी खाली लौट आता है। पर वह बहुत सरल और इनोसेंट समाज की घटनाएं है। क्योंकि समाज जितना सरल हो, जहां व्यक्तित्व का बोध जितना कम हो, वहां तीर्थ का यह प्रयोग काम करेगा, अन्यथा नहीं करेगा।
9-आज भी अगर आदिवासियों में जाए तो पांएगे कि उनमें व्यक्तित्व का बोध कम होता है। ‘’मैं’’ का ख्याल कम है, ‘’हम’’ का ख्याल ज्यादा है। कुछ तो ऐसी भाषाएं है जिसमें ‘’मैं’’ नहीं है। हम ही है। आदिवासी कबीलों की ढेर भाषाएं है जिनमें ‘’मैं’’ शब्द नहीं है। आदिवासी बोलता है, तो ‘’हम’’ बोलता है। ऐसा नहीं है कि भाषा ऐसी है। वहां 'मैं 'का कन्सेप्ट ही पैदा नहीं हुआ।और वह आपस में इतना जुड़ा हुआ है कि कई दफ़ा तो उसके बहुत अनूठे परिणाम
निकले है। सिंगापुर के पास एक छोटे से द्वीप पर जब पहली दफा पश्चिमी लोगों ने हमला किया तो वे बड़े हैरान हुए। जो कबीले का,चीफ़ /प्रमुख था वह किनारे पर आया , और जो हमलावर थे उनसे उसने कहा कि ''हम निहत्थे लोग जरूर है ; पर हम परतंत्र नहीं हो सकते''।
10-पश्चिमी लोगों ने कहा कि वह तो होना ही पड़ेगा। उन कबीले वालों ने कहा, ''हमारे पास लड़ाई का उपाय तो कुछ नहीं है, लेकिन हम मरना जानते है ....हम मर जांएगे''। उन्हें भरोसा नहीं आया कि कोई ऐसे कैसे मरता है, लेकिन यह ऐतिहासिक घटनाओं में एक बड़ी
अद्भुत घटना है।जब वे राज़ी नहीं हुए तो पूरा कबीला इकट्ठा हुआ। कोई पाँच सौ लोग तट पर इकट्ठे हुए और वह देखकर दंग रह गए कि उनका प्रमुख पहले मरकर गिर गया। और फिर दूसरे लोग मरकर गिरने लगे ..बिना किसी हथियार की चोट के।यह देख कर,शत्रु घबरा गए। पहले तो उन्होंने समझा कि लोग डर कर ऐसे ही गिर गए होंगे। लेकिन देखा.. वह तो खत्म ही हो गए।
11-अभी तक यह साफ़ नहीं हो सका कि क्यों ऐसी घटना घटी।असल में 'हम' की कांशेसनेस अगर बहुत ज्यादा हो तो मृत्यु ऐसी संक्रामक हो सकती है।एक के मरते ही फैल सकती है।
ऐसे कई जानवर मर जाते है। जैसे भेड़ मर जाती है ...एक भेड़ मरी, कि मरना फैल जाता है। भेड़ के पास ‘’मैं’’ का बोध बहुत कम है, हम का बोध है। भेड़ों को चलते हुए देखे तो मालूम पड़ेगा कि 'ह'म चल रहा है, सब सटी हुई है एक दूसरे से, एक ही जीवन जैसे सरकता हो। एक भेड़ मरी, तो दूसरी भेड़ को मरने जैसा हो जाएगा, भीतर मृत्यु फैल जाएगी ।तो जब
समाज बहुत ‘’हम’’ के बोध से भरा था और ‘’मैं’’ का बोध बहुत कम था ...तब तीर्थ बड़ा कारगर था। उसकी उपयोगिता उसी मात्रा में कम हो जाएगी, जिस मात्रा में ‘’मैं’’ का बोध बढ़ जाएगा।
....SHIVOHAM....






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