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प्राचीन एवं गुहय स्वरोदय विज्ञान क्या है ?क्या महासाधना स्वरोदय विज्ञान के बिना .. संभव नहीं?क्या है

  • Writer: Chida nanda
    Chida nanda
  • Jun 26, 2018
  • 15 min read

जीवन में स्वर का महत्व ;- 07 FACTS;- 1-विश्वपिता विधाता ने मनुष्य के जन्म के समय में ही देह के साथ एक ऐसा आश्चर्यजनक कौशलपूर्ण अपूर्व उपाय रच दिया है जिसे जान लेने पर सांसारिक, वैषयिक किसी भी कार्य में असफलता का दु:ख नहीं हो सकता। हम इस अपूर्व कौशल को नहीं जानते, इसी कारण हमारा कार्य असफल हो जाता है, आशा भंग हो जाती है, हमें मनसंताप और रोग भोगना पड़ता है। यह विषय जिस शास्त्र में है, उसे स्वरोदय शास्त्र कहते हैं। 2-यह स्वरशास्त्र जैसा दुर्लभ है, स्वरज्ञ गुरु का भी उतना ही अभाव है। स्वरशास्त्र प्रत्यक्ष फल देने वाला है। पद-पद कर इसका प्रत्यक्ष फल देखकर आश्चर्यचकित होना पड़ता है। समग्र स्वरशास्त्र को ठीक-ठीक लिपिबद्ध करना बिलकुल असंभव है। केवल साधकों के काम की कुछ बातें यहां संक्षेप में दी जा रही हैं। स्वरशास्त्र सीखने के लिए श्वास-प्रश्वास की गति के संबंध में सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। 3-देहरूपी नगर में वायु राजा के समान है। प्राणवायु नि:श्वास और प्रश्वास इन दो नामों से पुकारा जाता है। वायु ग्रहण करने का नाम नि:श्वास और वायु के परित्याग करने का नाम प्रश्वास है। जीव के जन्म से मृत्यु के अंतिम क्षण तक निरंतर श्वास-प्रश्वास की क्रिया होती रहती है और यह नि:श्वास नासिका के दोनों छेदों से एक ही समय एकसाथ समान रूप से नहीं चला करता, कभी बाएं और कभी दाहिने पुट से चलता है। कभी-कभी एकाध घड़ी तक एक ही समय दोनों नाकों से समान भाव से श्वास प्रवाहित होता है। 4-स्वर विज्ञान इस संसार का बहुत ही महत्वपूर्ण और आसान ज्योतिष विज्ञान है जिसके बताये गए संकेत बिलकुल सही माने जाते है और इसकी सहायता से हम अपने जीवन कि दिशा और दशा को बदल सकते है।हमारे शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं, संसार के सभी व्यक्तियों से लेकर दैवीय सम्पर्कों तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। 5-स्वर विज्ञान कि सहायता से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में मनचाही सफलता हासिल कर सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और परिस्तिथियों को अपने पक्ष में कर सकता है। 6-हमारी नाक में दो छिद्र होते हैं। सामान्य अवस्था में इनमें से एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायें से तो कभी बाएं से इसे ही हम दायाँ और बायाँ स्वर का चलना कहते है। लेकिन जिस समय स्वर बदलता है तो उस समय कुछ पल के लिए दोनों छिद्रों से में हवा निकलती हुई महसूस होती है। इसके अलावा कभी - कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय हमारे दोनों नाक के छिद्रों से हवा निकलती है। 7-बांयी तरफ से सांस लेने का मतलब है कि हमारे शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु का प्रवाह है।इसके विपरीत दायीं तरफ से सांस लेने का मतलब है कि हमारे शरीर की पिंगला नाड़ी में वायु का प्रवाह है।लेकिन दोनों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है। स्वर को पहचानने की सरल विधियाँ;- 03 FACTS;- ==================== (1) शांत भाव से मन एकाग्र करके बैठ जाएँ। अपने दाएँ हाथ को नाक छिद्रों के पास ले जाएँ। तर्जनी अँगुली छिद्रों के नीचे रखकर श्वास बाहर फेंकिए। ऐसा करने पर आपको किसी एक छिद्र से श्वास का अधिक स्पर्श होगा। जिस तरफ के छिद्र से श्वास निकले, बस वही स्वर चल रहा है। (2) एक छिद्र से अधिक एवं दूसरे छिद्र से कम वेग का श्वास निकलता प्रतीत हो तो यह सुषुम्ना के साथ मुख्य स्वर कहलाएगा। (3) एक अन्य विधि के अनुसार आईने को नासाछिद्रों के नीचे रखें। जिस तरफ के छिद्र के नीचे काँच पर वाष्प के कण दिखाई दें, वही स्वर चालू समझें।

स्वरशास्त्र (IN NUTSHELL);- 11 FACTS;- 1-जब तक गहन साधना करने की उत्कण्ठा न हो, इस विज्ञान में बताई गयी निम्नलिखित बातों का नियमित पालन किया जा सकता है। इससे आपको दैनिक जीवन के कार्यों में सफलता मिलेगी, आपके आत्मविश्वास का स्तर काफी ऊँचा रहेगा, हीन भावना से मुक्त रहेंगे और आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। 2-हम अपनी नाक से निकलने वाली साँस के संकेतो को समझ कर अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में मनचाहा परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। जिस तिथि या वार को जिस छिद्र से साँस लेनी चाहिए, अगर वही होता है तो हमें उस दिन अच्छे परिणाम मिलेंगे । लेकिन अगर उल्टा हुआ तो हमें उस दिन निराशा मिल सकती है। इसलिये किस दिन किस छिद्र से साँस चलनी चाहिए हम इसका ज्ञान हासिल करके जीवन में लगातार उन्नति के पथ पर चल सकते है जो कि सभी के लिए बहुत ही आसान है। 3-बाएं नासापुट के श्वास को इडा में चलना, दाहिनी नासिका के श्वास को पिंगला में चलना और दोनों पुटों से एक समान चलने पर उसे सुषुम्ना में चलना कहते हैं। एक नासापुट को दबाकर दूसरे के द्वारा श्वास को बाहर निकालने पर यह साफ मालूम हो जाता है कि एक नासिका से सरलतापूर्वक श्वास प्रवाह चल रहा है और दूसरा नासापुट मानो बंद है अर्थात उससे दूसरी नासिका की तरह सरलतापूर्वक श्वास बाहर नहीं निकलता। जिस नासिका से सरलतापूर्वक श्वास बाहर निकलता हो, उस समय उसी नासिका का श्वास कहना चाहिए। 4-किस नासिका से श्वास बाहर निकल रहा है, इसको साधक उपर्युक्त प्रकार से समझ सकते हैं। क्रमश: अभ्यास होने पर बहुत आसानी से मालूम होने लगता है कि किस नासिका से नि:श्वास प्रवाहित होता है। प्रतिदिन प्रात:काल सूर्योदय के समय से ढाई-ढाई घड़ी के हिसाब से एक-एक नासिका से श्वास चलता है। इस प्रकार रात-दिन में 12 बार बाईं और 12 बार दाहिनी नासिका से क्रमानुसार श्वास चलता है। किस दिन किस नासिका से पहले श्वासक्रिया होती है, इसका एक निर्दिष्ट नियम है। 5-प्रतिदिन रा‍त-दिन की 60 घड़ियों में ढाई-ढाई घड़ी के हिसाब से एक-एक नासिका से निर्दिष्ट क्रम से श्वास चलने के समय क्रमश: पंचतत्वों का उदय होता है। इस श्वास-प्रश्वास की गति को समझकर कार्य करने पर शरीर स्वस्थ रहता है और मनुष्य दीर्घजीवी होता है, फलस्वरूप सांसारिक, वैषयिक सब कार्यों में सफलता मिलने के कारण सुखपूर्वक संसार यात्रा पूरी होती है। 6-सप्ताह के तीन दिन मंगल, शनि और रवि गर्म मने जाते है क्योंकि इनका संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष चार दिनों का संबंध चन्द्र स्वर से माना जाता है। 7-हमारे दांये छिद्र से निकलने वाली सांस पिंगला स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है और जैसा कि नाम ही है यह गरम होती है।और बांयी ओर से निकलने वाली साँस इड़ा स्वर को चन्द्र स्वर कहा जाता है और अपने नाम के अनुरूप यह यह स्वर ठण्डा होता है। 8-वाम नासिका का श्वासफल : जिस समय इडा नाड़ी से अर्थात बाईं नासिका से श्वास चलता हो, उस समय स्थिर कर्मों को करना चाहिए, जैसे अलंकार धारण, दूर की यात्रा, आश्रम में प्रवेश, राज मंदिर तथा महल बनाना तथा द्रव्यादि को ग्रहण करना। तालाब, कुआं आदि जलाशय तथा देवस्तंभ आदि की प्रतिष्ठा करना। इसी समय यात्रा, दान, विवाह, नया कपड़ा पहनना, शांतिकर्म, पौष्टिक कर्म, दिव्यौषध सेवन, रसायन कार्य, प्रभु दर्शन, मि‍त्रता स्थापन एवं बाहर जाना आदि शुभ कार्य करने चाहिए। बाईं नाक से श्वास चलने के समय शुभ कार्य करने पर उन सब कार्यों में सिद्धि मिलती है, परंतु वायु, अग्नि और आकाश तत्व उदय के समय उक्त कार्य नहीं करने चाहिए। 9-दक्षिण नासिका का श्वासफल : जिस समय पिंगला नाड़ी अर्थात दाहिनी नाक से श्वास चलता हो, उस समय कठिन कर्म करने चाहिए, जैसे कठिन क्रूर विद्या का अध्ययन और अध्यापन, स्त्री संसर्ग, नौकादि आरोहण, तान्त्रिकमतानुसार वीरमंत्रादिसम्मत उपासना, वैरी को दंड, शास्त्राभ्यास, गमन, पशु विक्रय, ईंट, पत्‍थर, काठ तथा रत्नादि का घिसना और छीलना, संगीत अभ्यास, यंत्र-तंत्र बनाना, किले और पहाड़ पर चढ़ना, हाथी, घोड़ा तथा रथ आदि की सवारी सीखना, व्यायाम, षट्कर्मसाधन, यक्षिणी, बेताल तथा भूतादिसाधन, औषधसेवन, लिपिलेखन, दान, क्रय-विक्रय, युद्ध, भोग, राजदर्शन, स्नानाहार आदि। 10-सुषुम्ना का श्वासफल : दोनों नाकों से श्वास चलने के समय किसी प्रकार का शुभ या अशुभ कार्य नहीं करना चाहिए। उस समय कोई भी काम करने से वह निष्फल ही होगा। उस समय योगाभ्यास और ध्यान-धारणादि के द्वारा केवल भगवान को स्मरण करना उचित है। सुषुम्ना नाड़ी से श्वास चलने के समय किसी को भी शाप या वर प्रदान करने पर वह सफल होता है। 11-श्वास-प्रश्वास की गति जानकर, तत्वज्ञान के अनुसार, तिथि-नक्षत्र के अनुसार, ठीक-ठीक नियमपूर्वक सब कर्मों को करने पर आशाभंगजनित मनस्ताप नहीं भोगना पड़ता। बुद्धिमान साधक इस संक्षिप्त अंश को पढ़कर यदि ठीक-ठीक कार्य करेंगे तो निश्चय ही सफल मनोरथ होंगे। अन्य उपाय ======== 03 FACTS;- 1-यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो जो स्वर नहीं चल रहा है, उस पैर को आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए तथा अचलित स्वर की ओर उस पुरुष या महिला को लेकर बातचीत करनी चाहिए। ऐसा करने से क्रोधी व्यक्ति के क्रोध को आपका अविचलित स्वर का शांत भाग शांत बना देगा और मनोरथ की सिद्धि होगी। 2-गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मंत्री आदि से वाम स्वर से ही वार्ता करनी चाहिए। कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यंत आवश्यक होता है लेकिन स्वर विपरीत चल रहा होता है।ऐसे समय स्वर बदलने के प्रयास करने चाहिए। 3-स्वर को परिवर्तित कर अपने अनुकूल करने के लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए। जिस नथुने से श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुने को दबाकर पहले नथुने से श्वास निकालें। इस तरह कुछ ही देर में स्वर परिवर्तित हो जाएगा। घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना प्रारंभ हो जाता है। दिनचर्या के कार्य स्वर के अनुसार;- 07 FACTS;- 1. प्रातः उठकर विस्तर पर ही बैठकर आँख बन्द किए हुए पता करें कि किस नाक से साँस चल रही है। यदि बायीं नाक से साँस चल रही हो, तो दक्षिण या पश्चिम की ओर मुँह कर लें। यदि दाहिनी नाक से साँस चल रही हो, तो उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाएँ। फिर जिस नाक से साँस चल रही है, उस हाथ की हथेली से उस ओर का चेहरा स्पर्श करें। 2. उक्त कार्य करते समय दाहिने स्वर का प्रवाह हो, तो सूर्य का ध्यान करते हुए अनुभव करें कि सूर्य की किरणें आकर आपके हृदय में प्रवेश कर आपके शरीर को शक्ति प्रदान कर रही हैं। यदि बाएँ स्वर का प्रवाह हो, तो पूर्णिमा के चन्द्रमा का ध्यान करें और अनुभव करें कि चन्द्रमा की किरणें आपके हृदय में प्रवेश कर रही हैं और अमृत उड़ेल रही हैं। 3. इसके बाद दोनों हाथेलियों को आवाहनी मुद्रा में एक साथ मिलाकर आँखें खोलें और जिस नाक से स्वर चल रहा है, उस हाथ की हथेली की तर्जनी उँगली के मूल को ध्यान केंद्रित करें, फिर हाथ मे निवास करने वाले देवी-देवताओं का दर्शन करने का प्रयास करें और साथ में निम्नलिखित श्लोक पढ़ते रहें;- कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्द प्रभाते करदर्शनम्।। अर्थात कर (हाथ) के अग्र भाग में लक्ष्मी निवास करती हैं, हाथ के बीच में माँ सरस्वती और हाथ के मूल में स्वयं गोविन्द निवास करते हैं। 4. तत्पश्चात् निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण करते हुए माँ पृथ्वी का स्मरण करें और साथ में पीले रंग की वर्गाकृति (तन्त्र और योग में पृथ्वी का बताया गया स्वरूप) का ध्यान करें- समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।। फिर जो स्वर चल रहा हो, उस हाथ से माता पृथ्वी का स्पर्श करें और वही पैर जमीन पर रखकर विस्तर से नीचे उतरें। 5-इसके दूसरे भाग में अपनी दिनचर्या के निम्नलिखित कार्य स्वर के अनुसार करें;- 04 POINTS;- 5-1. शौच सदा दाहिने स्वर के प्रवाहकाल में करें और लघुशंका (मूत्रत्याग) बाएँ स्वर के प्रवाहकाल में। 5-2. भोजन दाहिने स्वर के प्रवाहकाल में करें और भोजन के तुरन्त बाद 10-15 मिनट तक बाईँ करवट लेटें। 5-3. पानी सदा बाएँ स्वर के प्रवाह काल में पिएँ। 5-4- दाहिने स्वर के प्रवाह काल में सोएँ और बाएँ स्वर के प्रवाह काल में उठें। 6-स्वरनिज्ञान की दृष्टि से निम्नलिखत कार्य स्वर के अनुसार करने पर शुभ परिणाम देखने को मिलते हैं;- 06 POINTS;- 6-1. घर से बाहर जाते समय जो स्वर चल रहा हो, उसी पैर से दरवाजे से बाहर पहला कदम रखकर जाएँ। 6-2. दूसरों के घर में प्रवेश के समय दाहिने स्वर का प्रवाह काल उत्तम होता है। 6-3. जन-सभा को सम्बोधित करने या अध्ययन का प्रारम्भ करने के लिए बाएँ स्वर का चुनाव करना चाहिए। 6-4. ध्यान, मांगलिक कार्य आदि का प्रारम्भ, गृहप्रवेश आदि के लिए बायाँ स्वर चुनना चाहिए। 6-5. लम्बी यात्रा बाएँ स्वर के प्रवाहकाल में और छोटी यात्रा दाहिने स्वर के प्रवाहकाल में प्रारम्भ करनी चाहिए। 6-6. दिन में बाएँ स्वर का और रात्रि में दाहिने स्वर का चलना शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे अच्छा माना गया है। 7-इस प्रकार धीरे-धीरे एक-एक कर स्वर विज्ञान की बातों को अपनाते हुए हम अपने जीवन में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर सकते हैं। प्राचीन एवं गुहय स्वरोदय विज्ञान क्या है ?- 29 FACTS;- 1-मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं, प्रशाखाओं का जन्म हुआ एवं समय के प्रवाह ने उनके परिणामों के आधार पर उनमें अनेक संशोधन एवं परिवर्ध्दन को रूपायित किया। प्रकृति ने इस अखिल ब्रहमाण्ड में अनंत वैज्ञानिक प्रणालियाँ दे रखी हैं। हम एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज करते हैं तो उसके अन्दर अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ कार्यरत दिखती हैं। यदि हम सहज चित्त से उन्हें देखते हैं तो वे हमें विस्मय और आनन्द से रोमांचित कर देती हैं और यहीं से योग की भूमि तैयार होती है। 2-शिवसूत्र में भगवान शिव ने इसीलिए विस्मय को योग की भूमिका कहा है - 'विस्मयों योग भूमिका'। यहीं से सूक्ष्म-जगत से जुड़े प्रकृति प्रदत्त विज्ञान से मानव का परिचय होता है। इस क्षेत्र में भी अनन्त वैज्ञानिक प्रणालियाँ हैं और इन पर अनेक प्रामाणिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। इन्हीं वैज्ञानिक प्रणालियों में एक स्वरोदय विज्ञान भी हैं। जिस स्वरोदय विज्ञान की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं उसका सम्बन्ध मानव के श्वास-प्रश्वास से है। 3-यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि स्वरोदय विज्ञान और प्राणायाम दोनों एक नहीं हैं। स्वरोदय विज्ञान हमारे शरीर में निहित श्वास-प्रश्वास की व्याख्या करता है, जबकि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास का व्यायाम है। हालाँकि दोनों का साधक उन सभी आध्यात्मिक विभूतियों का स्वामी बनता है जिनका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। स्वरोदय विज्ञान एक अत्यन्त प्राचीन एवं गुहय विज्ञान है। 4-तत्व-मीमांसा (Metaphysics) की अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं की जितनी खुलकर चर्चा सामान्यतया हुई है, उतनी स्वरोदय की नहीं हुई है। जबकि इसका अभ्यास सामान्य व्यक्ति के लिए काफी लाभदायक है। एक ज्योतिषी के लिए तो इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक माना गया है। शिव स्वरोदय तो यहाँ तक कहता है कि स्वरोदय विज्ञान से रहित ज्योतिषी की वही दशा होती है जैसे बिना स्वामी के घर, शास्त्र विहीन मुख और सिर के बिना शरीर की। 5-शिव स्वरोदय इस विज्ञान को अत्यन्त गोपनीय बताता है ... ( यह स्वरोदय ज्ञान गोपनीय से भी गोपनीय है। इसके ज्ञाता को सभी लाभ मिलते हैं। यह विभिन्न विद्याओं (गुह्य) के मस्तक पर मणि के तुल्य है।) शायद इसीलिए अन्य गुह्य विद्याओं की तरह यह विद्या जन-सामान्य में प्रचलित नहीं हुई, जबकि सामान्य व्यक्तियों के उपयोग में आने वाली अत्यन्त लाभदायक बातों की चर्चा भी इसके अन्तर्गत की गई है। 6-स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्रसिध्द ग्रंथ शिव स्वरोदय है।स्वरोदय विज्ञान के अंतर्गत यहाँ मुख्य रूप से वायु, नाड़ी, तत्व, सूक्ष्म स्वर प्रणाली, इनके परस्पर सम्बन्ध, आवश्यकता के अनुसार स्वर बदलने की विधि तथा विभिन्न कार्यों के लिए स्वरों एवं तत्वों का चुनाव आदि की चर्चा की जाएगी। इसके अतिरिक्त, यहाँ स्वर के माध्यम से अपने स्वास्थ्य का ज्ञान प्राप्त करना एवं स्वर के माध्यम से विभिन्न रोगों के उपचार पर भी प्रकाश डाला जायेगा। 7-जीवनी शक्ति श्वास में अपने को अभिव्यक्त करती है। श्वास के द्वारा ही प्राणशक्ति (जीवनीशक्ति) को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए प्राण शब्द प्राय: श्वास के लिए प्रयुक्त होता है और इसे कभी प्राण वायु भी कहा जाता हैं। हमारे शरीर में 49 वायु की स्थितियाँ बतायी जाती है। इनमें से दस हमारी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों को संचालित करती हैं। यौगिक दृष्टि से इनमें पाँच सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं:- प्राण, अपान, समान, व्यान ओर उदान। 8-प्राण वायु... का कार्यक्षेत्र कण्ठ से हृदय-मूल तक माना गया है और इसका निवास हृदय में। इसकी ऊर्जा की गति ऊपर की ओर है। श्वास अन्दर लेना, निगलना, यहाँ तक कि मुँह का खुलना प्राण वायु की शक्ति से ही होता है। 9-इसके अतिरिक्त, ऑंख, कान, नाक और जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा तन्मात्राओं को ग्रहण करने की प्रक्रिया में भी इसी वायु का हाथ होता हैं। साथ ही यह हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है तथा मानसिक क्रिया जैसे सूचना लेना, उसे आत्मसात करना और उसमें तारतम्य स्थापित करने का कार्य भी सम्पादित करती है। 10-अपान वायु... का प्रवाह नाभि से नीचे की ओर होता है और वस्ति इसका निवास स्थल है। शरीर की उत्सर्जन क्रियाएँ इसी शक्ति से संचालित होती हैं। इस प्रकार यह वृक्क, ऑंतें, वस्ति (गुदा), मूत्राशय एवं जननेन्द्रियों की क्रियाओं को संचालित करती है। अपान वायु में व्यतिक्रम होने से मनुष्य में प्रेरणा का अभाव होता है और वह आलस्य, सुस्ती, भारीपन एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता से ग्रस्त हो जाता है। 11-समान वायु... हृदय और नाभि के मध्य सक्रिय रहती है और चयापचय गतिविधियों (Metabolic Activities) का नियमन करती है। कहा जाता है कि मुक्ति का कारक भी यही प्राण है। इसका निवास स्थान नाभि और ऑंतें हैं। यह अग्न्याशय, यकृत और अमाशय के कार्य को प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त यह हमारे भोजन का पाचन करती है और पोषक तत्वों को अपशिष्ट पदार्थों से विलग भी करती है। 12-इसकी अनियमितता से अच्छी भूख लगने और पर्याप्त खाना खाने के बाद भी खाए हुए भोजन का परिपाक समुचित रूप से नहीं होता है और चयापचय गतिविधियों के कारण उत्पन्न विष शरीर में ही घर करने लगता है, जिससे व्यक्ति अम्ल दोष का शिकार हो जाता है। जब यह प्राण संतुलित होता है तो हमारी विवेक बुध्दि सक्रिय रहती है और इसके असंतुलन से मानसिक भ्रांति और संशय उत्पन्न होते हैं। 13-उदान वायु ...प्राण वायु को फेफड़ों से बाहर निकालने का कार्य करती है। इसका निवास स्थान कंठ है और यह कंठ से ऊपर वाले भाग में गतिशील रहती है। यह नियमित होने पर हमारी वाक्क्षमता को सशक्त बनाती है और इसकी अनियमितता स्वर-तंत्र और श्वसन तंत्र की बीमारियों को जन्म देती है। साथ ही इसमें दोष उत्पन्न होने से मिचली भी आती है। सामान्य अवस्था में उदान वायु प्राण वायु को समान वायु से पृथक कर व्यान वायु से संगम कराने का कार्य करती है। 14-व्यान वायु....का जन्म प्राण, अपान, समान और उदान के संयोग से होता है। किन्तु व्यान के अभाव में अन्य चार वायु का अस्तित्व असंभव है, अर्थात् सभी प्राण एक दूसरे पर आश्रित हैं। व्यान वायु हमारे शरीर का संयोजक है। प्राण वायु को पूरे शरीर में व्याप्त करना, पोषक तत्वों का आवश्यकतानुसार वितरण, जीवन ऊर्जा का नियमन, शरीर के विभिन्न अंगों को स्वस्थ रखना, उनके विघटन पर अंकुश लगाना आदि इसके कार्य हैं। यह पूरे शरीर में समान रूप से सक्रिय रहती है। पूरे शरीर में इसका निवास है। 15-ज्ञानेन्द्रियों की ग्राहक क्षमता का नियामक व्यान वायु ही है। सभी ऐच्छिक एवं अनैच्छिक शारीरिक कार्यों का संचालन व्यान वायु ही करती हैं। हमारे शरीर का पर्यावरण के साथ संवाद या पर्यावरण के प्रति हमारी शारीरिक प्रतिक्रियाएं इसी वायु (प्राण) के कारण होती है। इन पाँचों प्राणों के द्वारा पाँच उपप्राणों का सृजन होता है जिन्हें नाग, कूर्म, कृकल (कृकर) देवदत्त और धनंजय कहा जाता है। 16-नाग वायु.. के कारण डकार एवं हिचकी आती हैं और मानसिक स्पष्टता (Clarity of Mind) बनी रहती है। पलकों का झपकना कूर्म वायु के कारण होता है। 17-कृकल (कृकर).. से भूख और प्यास लगती है तथा छींक आती हैं। देवदत्त.. के कारण जम्हाई आती है और यह निद्रा का कारक है। अन्तिम उपवायु धनंजय.. व्यान वायु की भाँति सर्वव्यापी है और मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक शरीर से चिपकी रहती है। इनके अतिरिक्त एक और वायु कही गयी है जिसे महावायु कहते हैं और यह हमारे मस्तिष्क की गतिविधियों को संचालित करती है। 18-उक्त वायु (प्राण) हमारे पूरे शरीर में नाड़ियों से होकर प्रवाहित होती हैं। वैसे शास्त्र हमारे शरीर में 72000 नाड़ियों की स्थिति बताते हैं, जिनमें से 10 मुख्य है:- इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी। शिव स्वरोदय में श्लोक संख्या 38 से 40 तक इन नाड़ियों का विवरण दिया गया हैं। 19- इन नाड़ियों की स्थिति शरीर के दस द्वारों (Openings)- दो नाक, दो ऑंखें, दो कान, मुख, जननेंद्रिय और गुदा उल्लिखित हैं। इन दस नाड़ियों में प्रथम तीन अर्थात् इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना प्रधान हैं। इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ क्रमश: चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी के नाम से भी जानी जाती हैं। इड़ा ऋणात्मक और पिंगला धनात्मक नाड़ी कही गयी है।इन्हें ही यिन और यंग के नाम से जाना जाता है। 20-सुषुम्ना उदासीन होती है। हमारी साँसें दोनों नासिकाओं से हमेशा नहीं चलतीं। ये कभी बायीं नासिका से तो कभी दाहिनी नासिका से चलती है। जब साँस बायीं नासिका से चलती है तो उसे इड़ा या चन्द्र स्वर कहते हैं तथा जब दाहिनी नासिका से चलती है तो पिंगला या सूर्य स्वर कहते हैं। जब इनका क्रम एक नासिका से दूसरी नासिका में परिवर्तित होना होता है तो उस समय थोड़ी देर के लिए दोनों नासिकाओं से साँस समान रूप से चलती है और तब उसे सुषुम्ना स्वर कहा जाता है। 21-लगभग एक घंटा साँस बाई नासिका से और फिर एक घंटा दाहिनी नासिका से चलती हैं और इस प्रकार इनका क्रम एक-एक घंटें पर बदलता रहता है। चन्द्र स्वर की प्रकृति शीतल और सूर्य नाड़ी की प्रकृति उष्ण होती है। इनका प्रवाह क्रम चन्द्रमास (Lunar Month) का अनुसरण करता है। अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया को सूर्योदय के समय बायीं नासिका से साँस चलती है और एक घंटें बाद फिर एक घंटें तक दाहिनी नाक से साँस चलती है। इस प्रकार इनका क्रम घंटें-घंटें पर बदलता रहता है। 22-इसके बाद तीन दिन तक अर्थात् चतुर्थी, पंचमी और षष्ठी को सूर्योदय के समय दाहिनी नासिका से साँस चलती है और फिर घंटें-घंटें पर इनका क्रम बदलता रहता है। इस प्रकार तीन-तीन दिन के बाद सूर्योदय के समय इनका क्रम बदलता रहता है। 23-कृष्ण पक्ष में यह क्रम उलट जाता है, अर्थात् पहले तीन दिन प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया के दिन प्रात: सूर्योदय के समय सूर्य स्वर प्रवाहित होता है। फिर तीन दिनों बाद चन्द्र स्वर तीन दिन तक चलता है और प्रतिदिन घंटें-घंटें पर इनका क्रम बदलता रहता है। 24- स्वामी राम ने अपनी पुस्तक Path of Fire and Light में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर की अवधि एक-एक घंटें के स्थान पर दो-दो घंटें लिखा है। सम्भवत: उन्होंने अपनी उक्त पुस्तक में जिस गुहय तांत्रिक ग्रंथ स्वर विवरण का उल्लेख किया है उसमें इस प्रकार का वर्णन हुआ हो। हालांकि उन्होंने इसके साथ यह भी लिखा है कि स्वरों में उक्त लयबध्दता पूर्णरूपेण तभी आती है जब व्यक्ति प्राणायाम का अभ्यास करता हो। शेष तथ्य लगभग अन्य स्वरोदय ग्रंथों के समान हैं। 25-कहा गया है कि शुक्ल पक्ष में सोमवार, बुधवार, गुरूवार और शुक्रवार को चन्द्रनाड़ी अधिक प्रभावशाली होती है और इसके प्रवाह काल में किया गया कार्य सफल होता है। वैसे ही कृष्ण पक्ष में मंगलवार, शनिवार और रविवार को सूर्य स्वर (नाड़ी) प्रभावशाली होता है और इस अवधि (सूर्य स्वर के प्रवाह काल) में किए गए कार्य प्राय: फलदायी होते हैं। 26-वैसे, शुक्ल पक्ष में चन्द्र स्वर और कृष्ण पक्ष में सूर्य स्वर प्रभावशाली होते हैं। जैसे सूर्य और चन्द्र इस जगत को प्रभावित करते हैं, वैसे ही सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं। कहा जाता है कि चन्द्र स्वर शरीर को अमृत से सींचता हैं और सूर्य स्वर उसकी नमी को सुखा देता है। जब दोनों स्वर मूलाधार चक्र, जहाँ कुण्डलिनी शक्ति सोती है, पर मिलते हैं तो उसे अमावस्या की संज्ञा दी गई है। 27- प्रकृति द्वारा प्रदत्त शरीर में स्वर पद्धति के अनुसार चौबीस घंटें में इनका बारह राशियों से सम्बन्ध का ज्ञान भी बड़ा रोचक है। चन्द्र स्वर का उदय वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में होता है तथा सूर्य स्वर का मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ राशियों में। 28-स्वरोदय विज्ञान के साधक स्वरों की प्राकृतिक पद्धति को बदल देते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक चन्द्र स्वर तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक सूर्य स्वर प्रवाहित करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो ऐसा करने में सक्षम होता है वह योगी है। 29-एक दिन में साँस की छ: ऋतुएं होती हैं। प्रात:काल बसन्त है, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्न वर्षा, सांयकाल शरद, मध्यरात्रि शीत और रात्रि का आखिरी हिस्सा हेमन्त ऋतु कहलाती है। ये स्वर पाँच महाभूतों को अपने में धारण किए रहते हैं या यों कहा जाए कि पंच महाभूत एक निश्चित क्रम में नियत अवधि तक चन्द्र और सूर्य स्वर में प्रवाहित होते हैं। प्राचीन एवं गुहय स्वरोदय विज्ञान

CONTD..

.....SHIVOHAM...


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